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Rigveda / 3 / 30 / 15

इन्द्र॒ दृह्य॑ यामको॒शा अ॑भूवन्य॒ज्ञाय॑ शिक्ष गृण॒ते सखि॑भ्यः। दु॒र्मा॒यवो॑ दु॒रेवा॒ मर्त्या॑सो निष॒ङ्गिणो॑ रि॒पवो॒ हन्त्वा॑सः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 30 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : इन्द्र॑। दृह्य॑। या॒म॒ऽको॒शाः। अ॒भू॒व॒न्। य॒ज्ञाय॑। शि॒क्ष॒। गृ॒ण॒ते। सखि॑ऽभ्यः। दुः॒ऽमा॒यवः॑। दुः॒ऽएवाः॑। मर्त्या॑सः। नि॒ष॒ङ्गिणः॑। रि॒पवः॑। हन्त्वा॑सः॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य के दाता ! जो (यामकोशाः) मार्गों के रोकनेवाले (अभूवन्) होते हैं उन (सखिभ्यः) मित्रों तथा (यज्ञाय) सङ्गति जन्य विशेष ज्ञान और (गृणते) स्तुति करनेवाले के अर्थ आप (शिक्षा) विद्या दान कीजिये जो (दुर्मायवः) बुरे प्रकार फेंकने वा (दुरेवाः) दुष्ट कर्म को पहुँचानेवाले (हन्त्वासः) मारने के योग्य (निषङ्गिणः) बहुत विशेष शस्त्रोंवाले (रिपवः) शत्रु (मर्त्यासः) मनुष्य हों, उनका नाश करके (दृह्य) बढ़िये ॥१५॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि सर्वदा सब प्रकार श्रेष्ठ पुरुषों की रक्षा विद्या और शिक्षा का दान और दुष्ट आचरणवालों का नाश करके सदैव बढ़ें ॥१५॥