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Rigveda / 3 / 32 / 7

यजा॑म॒ इन्नम॑सा वृ॒द्धमिन्द्रं॑ बृ॒हन्त॑मृ॒ष्वम॒जरं॒ युवा॑नम्। यस्य॑ प्रि॒ये म॒मतु॑र्य॒ज्ञिय॑स्य॒ न रोद॑सी महि॒मानं॑ म॒माते॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 32 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर कैसे ईश्वर की उपासना करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : यजा॑मः। इत्। नम॑सा। वृ॒द्धम्। इन्द्र॑म्। बृ॒हन्त॑म्। ऋ॒ष्वम्। अ॒जर॑म्। युवा॑नम्। यस्य॑। प्रि॒ये। म॒मतुः॑। य॒ज्ञिय॑स्य। न। रोद॑सी॒ इति॑। म॒हि॒मान॑म्। म॒माते॒ इति॑॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! हम लोग (यस्य) जिस (यज्ञियस्य) पूजा अर्थात् प्रीति करने योग्य परमेश्वर के (महिमानम्) महत्तत्व को (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी (न) नहीं (ममाते) नाप सकते और (प्रिये) प्रीति करानेवाले इस लोक और परलोक के सुखों ने नहीं (ममतुः) नापे हैं (इत्) उसी (युवानम्) सम्पूर्ण संसार के संयोग और विभाग के करनेवाले (अजरम्) बुढ़ापे से रहित (ऋष्वम्) श्रेष्ठ (बृहन्तम्) बढ़े (वृद्धम्) आयु को भोगे हुए वा विद्या से श्रेष्ठ (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्य्य करनेवाले परमेश्वर की (नमसा) सत्कार से (यजाम) पूजा करते हैं, उसकी तुम लोग भी पूजा करो ॥७॥

भावार्थ : जिस परमेश्वर की अपेक्षा कोई पदार्थ तुल्य वा अधिक नहीं, जो सब से श्रेष्ठ व्यापक विनाशरहित और पूज्य है, उसी परमात्मा की हम लोग निरन्तर उपासना करें ॥७॥