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Rigveda / 3 / 33 / 4

ए॒ना व॒यं पय॑सा॒ पिन्व॑माना॒ अनु॒ योनिं॑ दे॒वकृ॑तं॒ चर॑न्तीः। न वर्त॑वे प्रस॒वः सर्ग॑तक्तः किं॒युर्विप्रो॑ न॒द्यो॑ जोहवीति॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 33 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : नद्यः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : ए॒ना। व॒यम्। पय॑सा। पिन्व॑मानाः। अनु॑। योनि॑म्। दे॒वऽकृ॑तम्। चर॑न्तीः। न। वर्त॑वे। प्र॒ऽस॒वः। सर्ग॑ऽतक्तः। कि॒म्ऽयुः। विप्रः॑। न॒द्यः॑। जो॒ह॒वी॒ति॒॥

पदार्थ : जो (एना) इस (पयसा) जल से (पिन्वमानाः) सींचती हुईं (देवकृतम्) विद्वानों ने किये शास्त्र और (योनिम्) जल को (अनु, चरन्तीः) अनुकूल प्राप्त होनेवाली (नद्यः) नदियाँ (वर्त्तवे) स्वीकार करने को (न) नहीं निवृत्त होती हैं उनको (वयम्) हम लोग प्राप्त होवें जो (सर्गतक्तः) उत्पत्ति में प्रसन्न (प्रसवः) सन्तान (किंयुः) अपने को क्या इच्छा करनेवाला (विप्रः) बुद्धिमान् पुरुष (जोहवीति) बारम्बार शब्द करता है, वह हम लोगों को प्राप्त होवे ॥४॥

भावार्थ : जैसे जलसहित नदियाँ सबकी उपकार करनेवाली होतीं और कभी जल से हीन नहीं होती हैं, वैसे जो ब्रह्मचर्य से युक्त स्त्री और पुरुष का सन्तान उत्पन्न हो और धर्मसम्बन्धी ब्रह्मचर्य्य से सम्पूर्ण विद्याओं को प्राप्त होकर विद्वान् होता है, वही सबका उपकार कर सकता है ॥४॥