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Rigveda / 3 / 34 / 3

इन्द्रो॑ वृ॒त्रम॑वृणो॒च्छर्ध॑नीतिः॒ प्र मा॒यिना॑ममिना॒द्वर्प॑णीतिः। अह॒न्व्यं॑समु॒शध॒ग्वने॑ष्वा॒विर्धेना॑ अकृणोद्रा॒म्याणा॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 34 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर सूर्य के दृष्टान्त से राजधर्मविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : इन्द्रः॑। वृ॒त्रम्। अ॒वृ॒णो॒त्। शर्ध॑ऽनीतिः। प्र। मा॒यिना॑म्। अ॒मि॒ना॒त्। वर्प॑ऽनीतिः। अह॒न्। विऽअं॑सम्। उ॒शध॑क्। वने॑षु। आ॒विः। धेनाः॑। अ॒कृ॒णो॒त्। रा॒म्याणा॑म्॥

पदार्थ : हे राजन् ! जैसे सूर्य्य (वृत्रम्) मेघ को (व्यंसम्) कटे बाहु जिसके उस पुरुष के समान (अहन्) नाश करता है वैसे (शर्धनीतिः) सेना का नायक (वर्पणीतिः) रूप को प्राप्त करानेवाले (इन्द्रः) सूर्यवत् प्रतापी राजा आप (मायिनाम्) बुरी बुद्धि से युक्त पुरुषों की माया का (प्र, अमिनात्) नाश करैं (उशधक्) और युद्ध करनेवालों का नाशकर्त्ता पुरुष (वनेषु) जङ्गलों में (धेनाः) वाणियों को (अवृणोत्) घेरै (राम्याणाम्) सुन्दरों की वाणियों को (आविः) प्रकट (अकृणोत्) करै ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य मेघ का नाश करता है, वैसे ही दुष्ट आचरणवाले जनों का नाश और विद्यासम्बन्धी वाणियों का प्रचार करके सब लोगों को सेना और शिक्षा की वृद्धि करनी चाहिये ॥३॥