Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 35 / 5

मा ते॒ हरी॒ वृष॑णा वी॒तपृ॑ष्ठा॒ नि री॑रम॒न्यज॑मानासो अ॒न्ये। अ॒त्याया॑हि॒ शश्व॑तो व॒यं तेऽरं॑ सु॒तेभिः॑ कृणवाम॒ सोमैः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 35 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : मा। ते॒। हरी॒ इति॑। वृष॑णा। वी॒तऽपृ॑ष्ठा। नि। री॒र॒म॒न्। यज॑मानासः। अ॒न्ये। अ॒ति॒ऽआया॑हि। शश्व॑तः। व॒यम्। ते। अर॑म्। सु॒तेभिः॑। कृ॒ण॒वा॒म॒। सोमैः॑॥

पदार्थ : हे प्रतापयुक्त पुरुष ! जो (अन्ये) इससे और (यजमानासः) विद्या की सङ्गति के जाननेवाले (ते) आपके (वीतपृष्ठा) चौड़ी पीठों से युक्त (वृषणा) बलिष्ठ (हरी) वाहनों के ले चलनेवालों को (मा) नहीं (नि, रीरमन्) रमायैं उनको आप (अत्यायाहि) बड़े वेग से प्राप्त हूजिये वा छोड़िये और (शश्वतः) अनादि काल से सिद्धविद्या युक्त पुरुषों को प्राप्त हूजिये जिस (ते) आपके (सुतेभिः) उत्पन्न (सोमैः) ऐश्वर्य्यों से (अरम्) पूरे काम को (वयम्) हम लोग (कृणवाम) करें, वह आप हमारे पूरे काम को करो ॥५॥

भावार्थ : जो लोग अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को जाने विना इस विद्या के जाननेवाले जनों का उत्साह नहीं बढ़ाते, उनका उल्लङ्घन कर अनादि काल से सिद्ध विद्या के जाननेवाले विद्वानों के शरण जा के शिल्पविद्या से उत्पन्न कार्यों से पूर्ण मनोरथवाले हम लोग होवैं, इस प्रकार इच्छा करके नित्य प्रयत्न करैं ॥५॥