Rigveda / 3 / 37 / 2
अ॒र्वा॒चीनं॒ सु ते॒ मन॑ उ॒त चक्षुः॑ शतक्रतो। इन्द्र॑ कृ॒ण्वन्तु॑ वा॒घतः॑॥
Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 37 | Mantra No : 2
In English:
Seer : gopavana aatreyaH saptavadhrirvaa | Devta : indra: | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : arvaachiina.m su te mana uta chakShuH shatakrato. indra kRRiNvantu vaaghataH.
Component Words : arvaachiinam. su. te. manaH. uta. chakShuH. shatakrato iti shata.akrato. indra. kRRiNvantu. vaaghataH.
In Hindi:
ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।
पदपाठ : अ॒र्वा॒चीन॑म्। सु। ते॒। मनः॑। उ॒त। चक्षुः॑। श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो। इन्द्र॑। कृ॒ण्वन्तु॑। वा॒घतः॑॥
पदार्थ : हे (शतक्रतो) असंख्य बुद्धियुक्त (इन्द्र) दुष्ट पुरुषों के नाश करनेवाले ! जैसे (वाघतः) वाणी से दोषों के नाश करनेवाले बुद्धिमान् लोग (ते) आपके (अर्वाचीनम्) इस समय उत्तम शिक्षायुक्त (मनः) अन्तःकरण (उत) और (चक्षुः) नेत्र आदि इन्द्रिय को उत्तम गुणों से युक्त (सु, कृण्वन्तु) सिद्ध करैं वैसे ही आप आचरण करैं ॥२॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा आदि जन सदा यथार्थवक्ता पुरुष की शिक्षा में वर्त्तमान होके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करैं ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह।
पदपाठ : अ॒र्वा॒चीन॑म्। सु। ते॒। मनः॑। उ॒त। चक्षुः॑। श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो। इन्द्र॑। कृ॒ण्वन्तु॑। वा॒घतः॑॥
पदार्थ : (अर्वाचीनम्) इदानीं सुशिक्षितम् (सु) (ते) तव (मनः) अन्तःकरणम् (उत) (चक्षुः) चक्षुरादीन्द्रियम् (शतक्रतो) शतमसङ्ख्यः क्रतुः प्रज्ञा यस्य तत्सम्बुद्धौ (इन्द्र) दुष्टानां विदारक (कृण्वन्तु) निष्पादयन्तु (वाघतः) ये वाचा दोषान् घ्नन्ति ते मेधाविनः। वाघत इति मेधाविना०। निघं० ३। १५। ॥२॥
अन्वय : हे शतक्रतो इन्द्र ! यथा वाघतस्तेऽर्वाचीनं मन उत चक्षुश्च शुभगुणान्वितं सुकृण्वन्तु तथैव भवानाचरतु ॥२॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। राजादयो जनाः सदाऽऽप्तशिक्षायां वर्त्तित्वा धर्मार्थकाममोक्षान् साध्नुवन्तु ॥२॥