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Rigveda / 3 / 44 / 3

द्यामिन्द्रो॒ हरि॑धायसं पृथि॒वीं हरि॑वर्पसम्। अधा॑रयद्ध॒रितो॒र्भूरि॒ भोज॑नं॒ ययो॑र॒न्तर्हरि॒श्चर॑त्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 44 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : द्याम्। इन्द्रः॑। हरि॑ऽधायसम्। पृ॒थि॒वीम्। हरि॑ऽवर्पसम्। अधा॑रयत्। ह॒रितोः॑। भूरि॑। भोज॑नम्। ययोः॑। अ॒न्तः। हरिः॒। चर॑त्॥

पदार्थ : हे विद्वन् पुरुष ! जैसे (इन्द्रः) बिजुली वा सूर्य (हरिधायसम्) किरणों को धारण करने वा (द्याम्) प्रकाश लोक और (हरिवर्पसम्) जिसके रूप का प्रकाश करनेवाली किरणें विद्यमान उस (पृथिवीम्) पृथिवी को (अधारयत्) धारण करता है और जैसे (हरिः) हरनेवाला वायु (ययोः) जिन (हरितोः) हरनेवाले गुणों के (अन्तः) मध्य में वर्त्तमान हुआ (भूरि) बहुत (भोजनम्) पालन वा भक्षण का (चरत्) आचरण करता है, वैसे आप हूजिये ॥™३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य के सदृश नियमपूर्वक धर्मयुक्त कर्मों को सिद्ध करते और वायु के सदृश निरन्तर प्रयत्न करते हैं, वे बहुत ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर आनन्दित होते हैं ॥™३॥