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Rigveda / 3 / 50 / 2

आ ते॑ सप॒र्यू ज॒वसे॑ युनज्मि॒ ययो॒रनु॑ प्र॒दिवः॑ श्रु॒ष्टिमावः॑। इ॒ह त्वा॑ धेयु॒र्हर॑यः सुशिप्र॒ पिबा॒ त्व१॒॑स्य सुषु॑तस्य॒ चारोः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 50 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब प्रीति के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : आ। ते॒। स॒प॒र्यू इति॑। ज॒वसे॑। यु॒न॒ज्मि॒। ययोः॑। अनु॑। प्र॒ऽदिवः॑। श्रु॒ष्टिम्। आवः॑। इ॒ह। त्वा॒। धे॒युः॒। हर॑यः। सु॒ऽशि॒प्र॒। पिब॑। तु। अ॒स्य। सुऽसु॑तस्य। चारोः॑॥

पदार्थ : हे (सुशिप्र) सुन्दर मुखवाले ! आप (ययोः) जिनके (अनु, प्रदिवः) उत्तम प्रकाशों को (श्रुष्टिम्) शीघ्र (आवः) रक्षा करैं वे (इह) इस संसार में (सपर्य्यू) सेवा करनेवाले (ते) आपके (जवसे) वेग के लिये (आ, युनज्मि) संयुक्त करता हूँ। और जो (हरयः) पुरुषार्थी मनुष्य (त्वा) आपको (धेयुः) धारण करें उनके साथ (तु) शीघ्र (अस्य) इस (सुषुतस्य) उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त (चारोः) अतिश्रेष्ठ इस सोमलतारूप ओषधियों के अंश का (पिब) पान कीजिये ॥२॥

भावार्थ : इस संसार में जो लोग जिनके सेवक उन स्वामियों को चाहिये कि उन सेवकों का पोषण करें और सब लोग परस्पर प्रीति से सुख की उन्नति करें ॥२॥