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Rigveda / 3 / 53 / 3

शंसा॑वाध्वर्यो॒ प्रति॑ मे गृणी॒हीन्द्रा॑य॒ वाहः॑ कृणवाव॒ जुष्ट॑म्। एदं ब॒र्हिर्यज॑मानस्य सी॒दाथा॑ च भूदु॒क्थमिन्द्रा॑य श॒स्तम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 53 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब प्रजा के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : शंसा॑व। अ॒ध्व॒र्यो॒ इति॑। प्रति॑। मे॒। गृ॒णी॒हि॒। इन्द्रा॑य। वाहः॑। कृ॒ण॒वा॒व॒। जुष्ट॑म्। आ। इ॒दम्। ब॒र्हिः। यज॑मानस्य। सी॒द॒। अथ॑। च॒। भू॒त्। उ॒क्थम्। इन्द्रा॑य। श॒स्तम्॥

पदार्थ : हे (अध्वर्यो) नहीं हिंसा करनेवाले ! आप (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त पुरुष के लिये जो (उक्थम्) कहने योग्य (शस्तम्) प्रशंसा किये गये और (जुष्टम्) सेवित (इदम्) इस (बर्हिः) उत्तम स्थान को (यजमानस्य) प्राप्त हुए आपको (भूत्) प्रशंसित होवें उसके ऊपर (आ, सीद) विराजो। (अथ) अनन्तर (च) और अन्यों को प्राप्त होइये और मैं भी प्राप्त होऊँ ऐश्वर्य्य से युक्त पुरुष के लिये जो (वाहः) प्राप्त हुओं की (शंसाव) प्रशंसा करें और सिद्धि (कृणवाव) करें उनकी आप (मे) मेरे लिये (प्रति, गृणीहि) स्तुति करिये ॥३॥

भावार्थ : सब राजा और प्रजा के जनों को चाहिये कि जिन कर्मों से ऐश्वर्य की वृद्धि हो, उन कर्मों का सेवन करें और राजा की आज्ञा में वर्त्तमान होकर प्रशंसा को प्राप्त होवें ॥३॥