Rigveda / 3 / 54 / 17
म॒हत्तद्वः॑ कवय॒श्चारु॒ नाम॒ यद्ध॑ देवा॒ भव॑थ॒ विश्व॒ इन्द्रे॑। सख॑ ऋ॒भुभिः॑ पुरुहूत प्रि॒येभि॑रि॒मां धियं॑ सा॒तये॑ तक्षता नः॥
Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 54 | Mantra No : 17
In English:
Seer : prajaapatirvaishvaamitro vaachyo vaa | Devta : vishvedevaa: | Metre : bhuriktriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : mahattadvaH kavayashchaaru naama yaddha devaa bhavatha vishva indre. sakha RRIbhubhiH puruhuuta priyebhirimaa.m dhiya.m saataye takShataa naH.
Component Words : mahat. tat. vaH. kavayaH. chaaru. naama. yat. ha. devaaH. bhavatha. vishve. indre. sakhaaH. RRIbhu.abhiH. puru.ahuuta. priyebhiH. imaam. dhiyam. saataye. takShata. naH.
In Hindi:
ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।
पदपाठ : म॒हत्। तत्। वः॒। क॒व॒यः॒। चारु॑। नाम॑। यत्। ह॒। दे॒वाः॒। भव॑थ। विश्वे॑। इन्द्रे॑। सखाः॑। ऋ॒भुऽभिः॑। पु॒रु॒ऽहू॒त॒। प्रि॒येभिः॑। इ॒माम्। धिय॑म्। सा॒तये॑। त॒क्ष॒त॒। नः॒॥
पदार्थ : हे (कवयः) विद्वानों ! (वः) आप लोगों का (यत्) जो (महत्) बड़ा (चारु) सुन्दर (नाम) नाम है (तत्) वह और उससे युक्त (विश्वे) संम्पूर्ण (देवाः) विद्वान् और (ह) निश्चय आप लोग (भवथ) होओ (प्रियेभिः) अपने सदृश प्रिय (ऋतुभिः) बुद्धिमानों के साथ (इन्द्रे) अत्यन्त ऐश्वर्य्य वा राजा में (सातये) सत्य और असत्य के विचार के लिये (नः) हम लोगों की (इमाम्) इस (धियम्) बुद्धि की (तक्षत) रक्षा करो। और हे (पुरुहूत) बहुतों से प्रशंसित हुए राजेन्द्र ! आप इनके साथ (सखा) मित्र हुए इस बुद्धि को प्राप्त होओ ॥१७॥
भावार्थ : उन लोगों के ही नाम प्रशंसा करने योग्य और प्रसिद्ध होवें कि जो विद्वान् और अविद्वानों में मित्रता को प्राप्त होकर धर्म और अधर्म के विचार के लिये उत्तम बुद्धि सबके लिये देते हैं ॥१७॥
In Sanskrit:
ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह।
पदपाठ : म॒हत्। तत्। वः॒। क॒व॒यः॒। चारु॑। नाम॑। यत्। ह॒। दे॒वाः॒। भव॑थ। विश्वे॑। इन्द्रे॑। सखाः॑। ऋ॒भुऽभिः॑। पु॒रु॒ऽहू॒त॒। प्रि॒येभिः॑। इ॒माम्। धिय॑म्। सा॒तये॑। त॒क्ष॒त॒। नः॒॥
पदार्थ : (महत्) महान् (तत्) (वः) युष्माकम् (कवयः) विपश्चितः (चारु) सुन्दरम् (नाम) (यत्) (ह) किल (देवाः) विद्वांसः (भवथ) (विश्वे) (इन्द्रे) परमैश्वर्ये राज्ञि वा (सखा) सुहृत् (ऋतुभिः) मेधाविभिः सह (पुरुहूत) बहुभिः प्रशंसित (प्रियोभिः) स्वात्मवत् प्रियैः (इमाम्) प्रत्यक्षाम् (धियम्) प्रज्ञाम् (सातये) सत्याऽसत्ययोर्विवेकाय (तक्षत) रक्षत। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (नः) अस्माकम् ॥१७॥
अन्वय : हे कवयो वो यन्महच्चारु नाम नामास्ति तत्तेन युक्ता विश्वे देवा ह यूयं भवथ। प्रियेभिर्ऋतुभिः सहेन्द्रे सातये न इमां धियं तक्षत। हे पुरुहूत राजेन्द्र त्वमेतैः सह सखा सन्नेतां प्रज्ञां प्राप्नुहि ॥१७॥
भावार्थ : तेषामेव नामानि प्रशंसितानि प्रसिद्धानि स्युर्ये विद्वत्स्वविद्वत्सु मैत्रीमासाद्य धर्माऽधर्मविवेकाय शुद्धां प्रज्ञां सर्वेभ्यः प्रयच्छन्ति ॥१७॥