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Rigveda / 3 / 55 / 7

द्वि॒मा॒ता होता॑ वि॒दथे॑षु स॒म्राळन्वग्रं॒ चर॑ति॒ क्षेति॑ बु॒ध्नः। प्र रण्या॑नि रण्य॒वाचो॑ भरन्ते म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 55 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा, अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : 0

पदपाठ : द्वि॒ऽमा॒ता। होता॑। वि॒दथे॑षु। स॒म्ऽराट्। अनु॑। अग्र॑म्। चर॑ति। क्षेति॑। बु॒ध्नः। प्र। रण्या॑नि। र॒ण्य॒ऽवाचः॑। भ॒र॒न्ते॒। म॒हत्। दे॒वाना॑म्। अ॒सु॒र॒ऽत्वम्। एक॑म्॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जिस करके निर्माण किया गया (द्विमाता) दो वायु और आकाश हैं माता जिस सूर्य्य के वह (होता) लेने और देनेवाला (बुध्नः) अन्तरिक्ष निवास का स्थान विद्यमान है जिसका वह (विदथेषु) जानने योग्य पृथिवी आदिकों में (सम्राट्) जो उत्तम प्रकार प्रकाशमान है (अग्रम्) सबके मध्य केन्द्र स्थान जो कि ऊपर वर्त्तमान उसको (अनु, चरति) प्राप्त होता है वसता वा वसाता (रण्यानि) सुन्दर और लोकों में उत्पन्न हुओं को (प्र, क्षेति) वसता वा वसाता और जो (देवानाम्) विद्वानों में (महत्) बड़े (एकम्) सहायरहित (असुरत्वम्) प्राणों में रमनेवाले को (रण्यवाचः) रमणीय भाषाएँ (भरन्ते) धारण वा पोषण करती हैं, उस ही ब्रह्म की आप लोग सेवा करो ॥७॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर सूर्य्य आदि जगत् को निर्माण धारण और प्रकाश करके पालन करता है और जो सर्वत्र वसता हुआ सबको अपने में वसाता है, जिस एक ही को यथार्थ बोलनेवाले विद्वान् लोग सेवते हैं, उस ही की सब लोग उपासना करो ॥७॥