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Rigveda / 3 / 55 / 17

यद॒न्यासु॑ वृष॒भो रोर॑वीति॒ सो अ॒न्यस्मि॑न्यू॒थे नि द॑धाति॒ रेतः॑। स हि क्षपा॑वा॒न्त्स भगः॒ स राजा॑ म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 55 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा, इन्द्रः पर्जन्यात्मा त्वष्टा वाग्निश्च | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

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पदपाठ : यत्। अ॒न्यासु॑। वृ॒ष॒भः। रोर॑वीति। सः। अ॒न्यस्मि॑न्। यू॒थे। नि। द॒धा॒ति॒। रेतः॑। सः। हि। क्षपा॑ऽवान्। सः। भगः॑। सः। राजा॑। म॒हत्। दे॒वाना॑म्। अ॒सु॒र॒ऽत्वम्। एक॑म्॥

पदार्थ : (यत्) जो (वृषभः) बलयुक्त सूर्य्य (अन्यासु) रात्रि और प्रातःकालों में (रोरवीति) अत्यन्त शब्द करता है (सः) वह (अन्यस्मिन्) अन्य (यूथे) समूह में चन्द्र आदिकों में (रेतः) पराक्रम का (निदधाति) स्थापन करता है। (हि) जिससे कि (सः) वह (क्षपावान्) रात्रिवान् अर्थात् रात्रि जिसकी सम्बन्धिनी होती और (सः) वह (भगः) ऐश्वर्य्यों का दाता सूर्य्य तथा (सः) वह (राजा) प्रकाशमान होता (देवानाम्) विद्वानों में (महत्) बड़ा (एकम्) एक यह (असुरत्वम्) दोषों के दूर करनेवाला प्राप्त होने योग्य गुण होता है ॥१७॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो सूर्य्य रात्रि के अन्त और दिन के आदि में सब प्राणियों को निरन्तर जगाय के शब्द कराय और व्यवहार कराय के लक्ष्मियों को प्राप्त कराता है और रात्रि में चन्द्र आदिकों में किरणों को रख के प्रकाश कराता सो यह प्रकाशमान जगदीश्वर से उत्पन्न किया गया, ऐसा जानना चाहिये ॥१७॥