Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 56 / 4

अ॒भीक॑ आसां पद॒वीर॑बोध्यादि॒त्याना॑मह्वे॒ चारु॒ नाम॑। आप॑श्चिदस्मा अरमन्त दे॒वीः पृथ॒ग्व्रज॑न्तीः॒ परि॑ षीमवृञ्जन्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 56 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर भी ईश्वर के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : अ॒भीके॑। आ॒सा॒म्। प॒द॒ऽवीः। अ॒बो॒धि॒। आ॒दि॒त्याना॑म्। अ॒ह्वे॒। चारु॑। नाम॑। आपः॑। चि॒त्। अ॒स्मै॒। अ॒र॒म॒न्त॒। दे॒वीः। पृथ॑क्। व्रज॑न्तीः। परि॑। सी॒म्। अ॒वृ॒ञ्ज॒न्॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जिस जगदीश्वर ने (आसाम्) इन अनादि काल से सिद्ध प्रजाओं और (आदित्यानाम्) सूर्य्यादिकों वा मास आदि समय विभागों के (पदवीः) पदों को जो व्याप्त होता वह (अबोधि) जाना हुआ है और जिसका (चारु) अत्यन्त श्रेष्ठ (नाम) नाम जिसमें (चित्) निश्चित (व्रजन्तीः) जाते हुए (देवीः) प्रकाशमान (आपः) प्राण (सीम्) परिग्रह करने में (पृथक्) अलग-अलग (परि, अरमन्त) सब ओर से रमते और (अवृञ्जन्) त्याग करते हैं (अस्मै) इसके लिये (अभीके) कामना करनेवाले में वर्त्तमान मैं इस ईश्वर को (अह्वे) बुलाता हूँ, उसीको आप लोग भी बुलाओ ॥४॥

भावार्थ : हे मनुष्या जो सबके सुख की कामना करता है, जिसमें सब जीव और लोकादि पदार्थ पृथक्-पृथक् क्रीड़ा करते ग्रहण करते और त्याग करते हैं, उसको छोड़ के अन्य किसी की भी मत उपासना करो ॥४॥