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Rigveda / 3 / 57 / 3

या जा॒मयो॒ वृष्ण॑ इ॒च्छन्ति॑ श॒क्तिं न॑म॒स्यन्ती॑र्जानते॒ गर्भ॑मस्मिन्। अच्छा॑ पु॒त्रं धे॒नवो॑ वावशा॒ना म॒हश्च॑रन्ति॒ बिभ्र॑तं॒ वपूं॑षि॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 57 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब गृहाश्रम के कृत्य को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : याः। जा॒मयः॑। वृष्णे॑। इ॒च्छन्ति॑। श॒क्तिम्। न॒म॒स्यन्तीः॑। जा॒न॒ते॒। गर्भ॑म्। अ॒स्मि॒न्। अच्छ॑। पु॒त्रम्। धे॒नवः॑। वा॒व॒शा॒नाः। म॒हः। च॒र॒न्ति॒। बिभ्र॑तम्। वपूं॑षि॥

पदार्थ : (याः) जो (नमस्यन्तीः) सत्कार करती हुई (जामयः) चौबीस वर्ष की अवस्था को प्राप्त युवती ब्रह्मचारिणी (वृष्णे) वीर्यसेचन में समर्थ चालीस वर्ष की आयु को प्राप्त ब्रह्मचारी के लिये (शक्तिम्) सामर्थ्य की (इच्छन्ति) इच्छा करती और (अस्मिन्) इस संसार में (गर्भम्) गर्भ के धारण करने को (जानते) जानती हैं वे पतियों की (वावशानाः) कामना करती हुई (धेनवः) विद्या और उत्तम शिक्षायुक्त वाणियों के सदृश वर्त्तमान गौवें जैसे वृषभों को वैसे (महः) बड़े पूज्य (वपूंषि) रूपवाले शरीरों को (बिभ्रतम्) धारण और पोषण करनेवाले (अच्छ) श्रेष्ठ (पुत्रम्) पुत्र को (चरन्ति) ग्रहण करती हैं ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही कन्यायें सुख को प्राप्त होती हैं कि जो अपने से दुगने विद्या और शरीर बलवाले अपने सदृश प्रेमी पतियों की उत्तम प्रकार परीक्षा करके स्वीकार करती हैं, वैसे ही पुरुष लोग भी प्रेमपात्र स्त्रियों को ग्रहण करते हैं, वे ही परस्पर प्रीतिपूर्वक अनुकूल व्यवहार से वीर्यस्थापन और आकर्षण विद्या को जान गर्भ को धारण उसका उत्तम प्रकार पालन सब संस्कारों को करके बड़े भाग्यवाले पुत्रों को उत्पन्न कर अतुल आनन्द और विजय को प्राप्त होते हैं, इससे विपरीत व्यवहार से नहीं ॥३॥