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Rigveda / 3 / 58 / 3

सु॒युग्भि॒रश्वैः॑ सु॒वृता॒ रथे॑न॒ दस्रा॑वि॒मं शृ॑णुतं॒ श्लोक॒मद्रेः॑। किम॒ङ्ग वां॒ प्रत्यव॑र्तिं॒ गमि॑ष्ठा॒हुर्विप्रा॑सो अश्विना पुरा॒जाः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 58 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब अग्नि आदि पदार्थ चालितयान विषयक शिल्पिकृत्य को कहते हैं।

पदपाठ : सु॒युक्ऽभिः॑। अश्वैः॑। सु॒ऽवृता॑। रथे॑न। दस्रौ॑। इ॒मम्। शृ॒णु॒त॒म्। श्लोक॑म्। अद्रेः॑। किम्। अ॒ङ्ग। वा॒म्। प्रति॑। अव॑र्तिम्। गमि॑ष्ठा। आ॒हुः। विप्रा॑सः। अ॒श्वि॒ना॒। पु॒रा॒ऽजाः॥

पदार्थ : हे (दस्रौ) दुःखों को नाश करनेवाले (अश्विना) सूर्य्य और चन्द्रमा के सदृश वर्त्तमान अध्यापक और उपदेशक ! आप दोनों (सुयुग्भिः) उत्तम प्रकार जोड़े गये (अश्वैः) अग्नि आदि पदार्थों से युक्त (सुवृता) उत्तम (रथेन) विमान आदि वाहन से (अद्रेः) मेघ के सदृश हम लोगों की (इमम्) इस (श्लोकम्) वाणी को (शृणुतम्) सुनो और (अङ्ग) हे पूर्वोक्त अध्यापक उपदेशको ! जो (वाम्) तुम दोनों को (गमिष्ठा) अत्यन्त चलनेवाले (पुराजाः) प्रथम उत्पन्न हुए (विप्रासः) बुद्धिमान् विद्वान् लोग (आहुः) कहते हैं वे आप दोनों (प्रति, अवर्त्तिम्) अवर्त्तमान अर्थात् अलभ्य पदार्थ को (किम्) क्यों नहीं प्राप्त हों किन्तु प्राप्त ही होवैं ॥३॥

भावार्थ : जो विद्वान् लोग अग्नि आदि विद्या से चलाये वाहनों से व्यवहार करैं, वे किस-किस ऐश्वर्य्य को न प्राप्त होवैं ॥३॥