Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 60 / 3

इन्द्र॑स्य स॒ख्यमृ॒भवः॒ समा॑नशु॒र्मनो॒र्नपा॑तो अ॒पसो॑ दधन्विरे। सौ॒ध॒न्व॒नासो॑ अमृत॒त्वमेरि॑रे वि॒ष्ट्वी शमी॑भिः सु॒कृतः॑ सुकृ॒त्यया॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 60 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : ऋभवः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब सर्वाधीश परमात्मा की मित्रता का फल अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : इन्द्र॑स्य। स॒ख्यम्। ऋ॒भवः॑। सम्। आ॒न॒शुः॒। मनोः॑। नपा॑तः। अ॒पसः॑। द॒ध॒न्वि॒रे॒। सौ॒ध॒न्व॒नासः॑। अ॒मृ॒त॒ऽत्वम्। आ। ई॒रि॒रे॒। वि॒ष्ट्वी। शमी॑भिः। सु॒ऽकृतः॑। सु॒ऽकृ॒त्यया॑॥

पदार्थ : जो (ऋभवः) बुद्धिमान् लोग (इन्द्रस्य) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त परमात्मा की (सख्यम्) मित्रता को (सम्, आनशुः) उत्तम प्रकार प्राप्त होवैं तथा जिस (मनोः) मनन करनेवाले का (नपातः) नहीं गिरना होता उसके लिये (अपसः) कर्मों को (दधन्विरे) धारण करते हैं वे (सौधन्वनासः) उत्तमज्ञान के युक्त करनेवाले (शमीभिः) कर्मों के साथ (विष्ट्वी) कर्म को करके (सुकृत्यया) धर्म की क्रिया से (सुकृतः) उत्तमकर्म करनेवाले होते हुए (अमृतत्वम्) मोक्षपदवी को (आ, ईरिरे) प्राप्त होते हैं ॥३॥

भावार्थ : जो लोग परमेश्वर में प्रीति और उसकी आज्ञा के भङ्ग होने से भय तथा धर्म का आचरण करते हैं, वे ही मोक्ष पदवी को प्राप्त होते हैं ॥३॥