Rigveda / 4 / 1 / 2
स भ्रात॑रं॒ वरु॑णमग्न॒ आ व॑वृत्स्व दे॒वाँ अच्छा॑ सुम॒तीय॒ज्ञव॑नसं॒ ज्येष्ठं॑ य॒ज्ञव॑नसम्। ऋ॒तावा॑नमादि॒त्यं च॑र्षणी॒धृतं॒ राजा॑नं चर्षणी॒धृत॑म् ॥२॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 1 | Mantra No : 2
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : agnirvaa varuNashcha | Metre : atijagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : sa bhraatara.m varuNamagna aa vavRRitsva devaa.N achChaa sumatiiyaj~navanasa.m jyeShTha.m yaj~navanasam. RRItaavaanamaaditya.m charShaNiidhRRita.m raajaana.m charShaNiidhRRitam .2.
Component Words : saH. bhraataram. varuNam. agne. aa. vavRRitsva. devaan. achCha. su.amatii. yaj~na.avanasam. jyeShTham. yaj~na.avanasam. RRIta.avaanam. aadityam. charShaNi.adhRRitam. raajaanam. charShaNi.adhRRitam.2.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निर्वा वरुणश्च | छन्द : अतिजगती | स्वर : निषादः
विषय : अब इस अगले मन्त्र में वाणी के विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : सः। भ्रात॑रम्। वरु॑णम्। अ॒ग्ने॒। आ। व॒वृ॒त्स्व॒। दे॒वान्। अच्छ॑। सु॒ऽम॒ती। य॒ज्ञऽव॑नसम्। ज्येष्ठ॑म्। य॒ज्ञऽव॑नसम्। ऋ॒तऽवा॑नम्। आ॒दि॒त्यम्। च॒र्ष॒णि॒ऽधृत॑म्। राजा॑नम्। च॒र्ष॒णि॒ऽधृत॑म्॥२॥
पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वन् ! (सः) वह आप (भ्रातरम्) प्रियबन्धु के सदृश (वरुणम्) श्रेष्ठजन को (सुमती) श्रेष्ठ बुद्धि से (यज्ञवनसम्) विद्याव्यवहार के विभाग करनेवाले (ज्येष्ठम्) विद्या से वृद्ध अध्यापक (यज्ञवनसम्) राज्यव्यवहार के विभाग करनेवाले (राजानम्) प्रकाशमान नरेश विद्याव्यवहार के विभाग करनेवाले (चर्षणीधृतम्) मनुष्यों के धारणकर्त्ता वा विद्वानों से धारण किये गए (आदित्यम्) सूर्य के सदृश वर्त्तमान (ऋतावानम्) सत्य के विभागकर्त्ता प्रकाशमान [राजा] (चर्षणीधृतम्) सत्यासत्य की विवेचना करनेवालों के धारण करनेवाले अध्यापक वा उपदेशक (देवान्) और धार्मिक विद्वानों को (अच्छ) अच्छे प्रकार (आ, ववृत्स्व) सब ओर से वर्त्तिये अर्थात् उनके अनुकूल वर्त्तमान कीजिये ॥२॥
भावार्थ : हे अध्यापक वा राजन् ! आप श्रेष्ठ श्रोतृजन वा मन्त्रियों को उत्तम मति और सत्य आचरण से संयुक्त करके संगत कर्मों का सेवन कराओ और सूर्य्य के सदृश विद्या न्याय का प्रकाश निरन्तर करो ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निर्वा वरुणश्च | छन्द : अतिजगती | स्वर : निषादः
विषय : वाणीविषयमाह
पदपाठ : सः। भ्रात॑रम्। वरु॑णम्। अ॒ग्ने॒। आ। व॒वृ॒त्स्व॒। दे॒वान्। अच्छ॑। सु॒ऽम॒ती। य॒ज्ञऽव॑नसम्। ज्येष्ठ॑म्। य॒ज्ञऽव॑नसम्। ऋ॒तऽवा॑नम्। आ॒दि॒त्यम्। च॒र्ष॒णि॒ऽधृत॑म्। राजा॑नम्। च॒र्ष॒णि॒ऽधृत॑म्॥२॥
पदार्थ : (सः) (भ्रातरम्) प्रियं बन्धुमिव (वरुणम्) श्रेष्ठं जनम् (अग्ने) (आ) (ववृत्स्व) समन्तात् वर्त्तस्व (देवान्) धार्मिकान् विदुषः (अच्छ) सम्यक् (सुमती) शोभनया प्रज्ञया (यज्ञवनसम्) यज्ञस्य विद्याव्यवहारस्य विभाजकम् (ज्येष्ठम्) विद्यावृद्धम् (यज्ञवनसम्) राज्यव्यवहारस्य विभक्तारम् (ऋतावानम्) सत्यस्य सम्भक्तारम् (आदित्यम्) सूर्यमिव वर्त्तमानम् (चर्षणीधृतम्) मनुष्याणां धर्त्तारं विद्वद्भिर्धृतं वा (राजानम्) प्रकाशमानं नरेशम् (चर्षणीधृतम्) चर्षणीनां सत्याऽसत्यविवेचकानां धर्त्तारम् ॥२॥
अन्वय : हे अग्ने ! स त्वं भ्रातरमिव वरुणं सुमती यज्ञवनसं ज्येष्ठमध्यापकं यज्ञवनसं राजानं यज्ञवनसं चर्षणीधृतमादित्यमिव ऋतावानं राजानं चर्षणीधृतमध्यापकमुपदेशकं वा देवानच्छा ववृत्स्व ॥२॥
भावार्थ : हे अध्यापक राजन् वा ! त्वं श्रेष्ठाञ्च्छ्रोत्रीनमात्यान् वा सुमत्या सत्याचरणेन संयोज्य सङ्गतानि कर्माणि जोषय सूर्य्यवद्विद्यान्यायप्रकाशं च सततं कुरु ॥२॥