Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 1 / 10

स तू नो॑ अ॒ग्निर्न॑यतु प्रजा॒नन्नच्छा॒ रत्नं॑ दे॒वभ॑क्तं॒ यद॑स्य। धि॒या यद्विश्वे॑ अ॒मृता॒ अकृ॑ण्व॒न्द्यौष्पि॒ता ज॑नि॒ता स॒त्यमु॑क्षन् ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 1 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। तु। नः॒। अ॒ग्निः। न॒य॒तु॒। प्र॒जा॒नन्। अच्छ॑। रत्न॑म्। दे॒वऽभक्तम्। यत्। अ॒स्य॒। धि॒या। यत्। विश्वे॑। अ॒मृताः॑। अकृ॑ण्वन्। द्यौः। पि॒ता। ज॒नि॒ता। स॒त्यम्। उ॒क्ष॒न्॥१०॥

पदार्थ : हे राजन् ! जैसे (सः) वह (अस्य) इस संसार का (पिता) पालन करने और (जनिता) उत्पन्न करनेवाला (द्यौः) प्रकाशमान (अग्निः) अपने से प्रकाशरूप परमात्मा के सदृश राजा (धिया) बुद्धि से सब को (प्रजानन्) जानता हुआ (नः) हम लोगों को (यत्) जो (देवभक्तम्) देवों से सेवित (रत्नम्) सुन्दर धन को (अच्छ) उत्तम प्रकार प्राप्त कराता है, वैसे आप (नयतु) प्राप्त कराइये (यत्) जिसमें (तु) फिर (विश्वे) सब (अमृताः) जन्म और मृत्यु से रहित जीव (सत्यम्) सत्य का (उक्षन्) सेवन करते हुए मोक्ष को (अकृण्वन्) करते हैं, वहाँ ही स्थित हो और सत्य का सेवन और धर्म से राज्य का पालन करके मोक्ष को प्राप्त होइये ॥१०॥

भावार्थ : हे राजा आदि मनुष्यों ! जैसे सब जगत् का पालन और उत्पन्न करनेवाला परमात्मा दया से सब जीवों के सुख के लिये अनेक प्रकार के पदार्थों को रच और दे के अभिमान नहीं करता है, वैसे ही आप लोग होइये और ईश्वर के उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभावों के तुल्य अपने गुण, कर्म्म और स्वभावों को करके राज्य आदि का पालन करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त होओ ॥१०॥