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Rigveda / 4 / 1 / 16

ते म॑न्वत प्रथ॒मं नाम॑ धे॒नोस्त्रिः स॒प्त मा॒तुः प॑र॒माणि॑ विन्दन्। तज्जा॑न॒तीर॒भ्य॑नूषत॒ व्रा आ॒विर्भु॑वदरु॒णीर्य॒शसा॒ गोः ॥१६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 1 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : ते। म॒न्व॒त॒। प्र॒थ॒मम्। नाम॑। धे॒नोः। त्रिः। स॒प्त। मा॒तुः। प॒र॒माणि॑। वि॒न्द॒न्। तत्। जा॒न॒तीः। अ॒भिः। अ॒नू॒ष॒त॒। व्राः। आ॒विः। भु॒व॒त्। अ॒रु॒णीः। य॒शसा॑। गोः॥१६॥

पदार्थ : जो (मातुः) माता के सदृश (धेनोः) वाणी के (सप्त) सात अर्थात् सात गायत्र्यादि छन्दों में विभक्त (परमाणि) उत्तम व्यवहारों को (विन्दन्) जानते हैं (ते) वे इसके (प्रथमम्) प्रसिद्ध (नाम) स्तुतिसाधक शब्दमात्र को (त्रिः) तीन वार (मन्वत) मानते हैं और जो (यशसा) कीर्ति के साथ वर्त्तमान (आविः) प्रकट (भुवत्) होवे वह (तत्) उस (गोः) वाणी के विज्ञान को जाने और जो कीर्ति से प्रकट होवें वे (अरुणीः) रक्तगुण से विशिष्ट (जानतीः) विज्ञानवाली (व्राः) प्रकट होनेवालियों की (अभि) सब प्रकार (अनूषत) स्तुति करते हैं ॥१६॥

भावार्थ : जैसे कामधेनु दुग्ध आदि से इच्छा को पूर्ण करती है, वैसी ही विद्या और उत्तम शिक्षा से युक्त वाणी विद्वानों को प्रसन्न करती है। जो लोग धर्म का आचरण करते हैं, वे यशस्वी होकर सर्वत्र प्रसिद्ध होते हैं ॥१६॥