Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 2 / 12

क॒विं श॑शासुः क॒वयोऽद॑ब्धा निधा॒रय॑न्तो॒ दुर्या॑स्वा॒योः। अत॒स्त्वं दृश्याँ॑ अग्न ए॒तान्प॒ड्भिः प॑श्ये॒रद्भु॑ताँ अ॒र्य एवैः॑ ॥१२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 2 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : क॒वि॑म्। श॒शा॒सुः॒। क॒वयः॑। अद॑ब्धाः। नि॒ऽधा॒रय॑न्तः। दुर्या॑सु। आ॒योः। अतः॑। त्वम्। दृश्या॑न्। अ॒ग्ने॒। ए॒तान्। प॒ट्ऽभिः। प॒श्येः॒। अद्भु॑तान्। अ॒र्यः। एवैः॑॥१२॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रकाशमान विद्वन् पुरुष ! जैसे (अदब्धाः) अहिंसनीय (कवयः) बुद्धिमान् पण्डित लोग (कविम्) उत्तम बुद्धिवाले को (दुर्यासु) गृहों में [अहिंसनीय] (निधारयन्तः) धारण करते हुए (शशासुः) शासन करते हैं (आयोः) जीवन की वृद्धि का शासन करते हैं (अतः) इस कारण से (त्वम्) आप (एवैः) प्राप्त (पड्भिः) विज्ञान आदिकों से (एतान्) इन प्रत्यक्ष (अद्भुतान्) आश्चर्ययुक्त गुण, कर्म और स्वभाववाले (दृश्यान्) देखने योग्य श्रेष्ठ बुद्धिवाले जनों को (अर्यः) स्वामी के समान (पश्येः) देखिये ॥१२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो अध्यापक और उपदेशक लोग बुद्धिमान् पुरुषों को पढ़ाते और उपदेश देते हैं, उनका सदा ही सत्कार करो, जिससे कि मनुष्य लोग आश्चर्ययुक्त गुण, कर्म और स्वभाववाले होवें ॥१२॥