Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 27 / 10

जरा॑बोध॒ तद्वि॑विड्ढि वि॒शेवि॑शे य॒ज्ञिया॑य। स्तोमं॑ रु॒द्राय॒ दृशी॑कम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 27 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : शुनःशेप आजीगर्तिः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदपाठ : जरा॑ऽबोध। तत्। वि॒वि॒ड्ढि॒। वि॒शेऽवि॑शे। य॒ज्ञिया॑य। स्तोम॑म्। रु॒द्राय॑। दृशी॑कम्॥

पदार्थ : हे (जराबोध) गुण कीर्त्तन से प्रकाशित होनेवाले सेनापति आप जिससे (विशेविशे) प्राणी-प्राणी के सुख के लिये (यज्ञियाय) यज्ञकर्म के योग्य (रुद्राय) दुष्टों को रुलानेवाले के लिये सब पदार्थों को प्रकाशित करनेवाले (दृशीकम्) देखने योग्य (स्तोमम्) स्तुतिसमूह गुणकीर्त्तन को (विविड्ढि) व्याप्त करते हो, (तत्) इससे माननीय हो॥१०॥

भावार्थ : इस मन्त्र में पूर्णोपमालङ्कार है। युद्धविद्या के जाननेवाले के गुणों को श्रवण करे विना इस का ज्ञान नहीं होता और जो प्रजा के सुख के लिये अतितीक्ष्ण स्वभाववाले शत्रुओं के बल के नाश करनेहारे भृत्यों को अच्छी शिक्षा दे कर रखता है, वही प्रजापालन में योग्य होता है॥१०॥