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Rigveda / 1 / 27 / 12

स रे॒वाँइ॑व वि॒श्पति॒र्दैव्यः॑ के॒तुः शृ॑णोतु नः। उ॒क्थैर॒ग्निर्बृ॒हद्भा॑नुः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 27 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : शुनःशेप आजीगर्तिः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदपाठ : सः। रे॒वान्ऽइ॑व। वि॒श्पतिः॑। दैव्यः॑। के॒तुः। शृ॒णो॒तु॒। नः॒। उ॒क्थैः। अ॒ग्निः। बृ॒हत्ऽभा॑नुः॥

पदार्थ : हे विद्वान् मनुष्य ! तुम जो (दैव्यः) देवों में कुशल (केतुः) रोग को दूर करने में हेतु (विश्पतिः) प्रजा को पालनेवाला (बृहद्भानुः) बहुत प्रकाशयुक्त (रेवान् इव) अत्यन्त धनवाले के समान (अग्निः) सबको सुख प्राप्त करनेवाला अग्नि है (उक्थैः) वेदोक्त स्तोत्रों के साथ सुना जाता है, उसको (शृणोतु) सुन और (नः) हम लोगों के लिये सुनाइये॥१२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पूर्ण धनवाला विद्वान् मनुष्य धन भोगने योग्य पदार्थों से सब मनुष्यों को सुखसंयुक्त करता और सब की वार्त्ताओं को सुनता है, वैसे ही जगदीश्वर सबकी की हुई स्तुति को सुनकर उनको सुखसंयुक्त करता है॥१२॥