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Rigveda / 4 / 4 / 4

उद॑ग्ने तिष्ठ॒ प्रत्या त॑नुष्व॒ न्य१॒॑मित्राँ॑ ओषतात्तिग्महेते। यो नो॒ अरा॑तिं समिधान च॒क्रे नी॒चा तं ध॑क्ष्यत॒सं न शुष्क॑म् ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 4 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : रक्षोहाऽग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : उत्। अ॒ग्ने॒। ति॒ष्ठ॒। प्रति॑। आ। त॒नु॒ष्व॒। नि। अ॒मित्रा॑न्। ओ॒ष॒ता॒त्। ति॒ग्म॒ऽहे॒ते॒। यः। नः॒। अरा॒॑तिम्। स॒म्ऽइ॒धा॒न॒। च॒क्रे। नी॒चा। तम्। ध॒क्षि॒। अ॒त॒सम्। न। शुष्क॑म्॥४॥

पदार्थ : हे (समिधान) उत्तम प्रकार प्रकाशमान और (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान आप (उत्, तिष्ठ) उद्युक्त हूजिये (आ, तनुष्व) अच्छे प्रकार विस्तृत हूजिये (अमित्रान्) शत्रुओं के (प्रति) प्रति (नि, ओषतात्) निरन्तर दाह देओ (तिग्महेते) हे अत्यन्त तीव्र वृद्धिवाले ! (यः) जो (नः) हम लोगों के (अरातिम्) एक शत्रु और अनेक शत्रुओं को (नीचा) नीच (चक्रे) कर चुका अर्थात् सब से बढ़ गया (तम्) उसको (शुष्कम्) गीलेपन से रहित (अतसम्) कूप के (न) सदृश जिससे आप (धक्षि) जलाते हो, इससे वह आप राज्य के योग्य हो ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि आलस्य त्याग के पुरुषार्थ का विस्तार करके शत्रुओं को जलावें और अन्धकूप के सदृश कारागृह में उनका बन्धन करें और नीचता को प्राप्त करे [=करायें]। जो लोग ऐसा करते हैं, उनकी राजा गुरु के सदृश सेवा करे ॥४॥