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Rigveda / 4 / 4 / 10

यस्त्वा॒ स्वश्वः॑ सुहिर॒ण्यो अ॑ग्न उप॒याति॒ वसु॑मता॒ रथे॑न। तस्य॑ त्रा॒ता भ॑वसि॒ तस्य॒ सखा॒ यस्त॑ आति॒थ्यमा॑नु॒षग्जुजो॑षत् ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 4 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : रक्षोहाऽग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यः। त्वा॒। सु॒ऽअश्वः॑। सु॒ऽहि॒र॒ण्यः। अ॒ग्ने॒। उ॒प॒ऽयाति॑। वसु॑ऽमता। रथे॑न। तस्य॑। त्रा॒ता। भ॒व॒सि॒। तस्य॑। सखा॑। यः। ते॒। आ॒ति॒थ्यम्। आ॒नु॒षक्। जुजो॑षत्॥१०॥

पदार्थ : हे (अग्ने) राजन् (यः) जो (ते) आपकी (आनुषक्) अनुकूलता से वर्त्तमान (आतिथ्यम्) अतिथि के सदृश सत्कार की (जुजोषत्) निरन्तर सेवा करे (यः) जो (सुहिरण्यः) उत्तम सुवर्ण आदि धनयुक्त और (स्वश्वः) सुन्दर घोड़ों से युक्त पुरुष (वसुमता) बहुत धन से युक्त (रथेन) रमणीय वाहन से (त्वा) आपके (उपयाति) समीप प्राप्त होता है (तस्य) उसके आप (त्राता) रक्षा करनेवाले (भवसि) हूजिये और (तस्य) उसके (सखा) मित्र हूजिये ॥१०॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो आपके राज्य के उपकार करने और सत्कार करनेवाले हों, उनके ही मित्र और रक्षा करनेवाले हुए चकवर्त्ती हूजिये ॥१०॥