Rigveda / 4 / 4 / 12
अस्व॑प्नजस्त॒रण॑यः सु॒शेवा॒ अत॑न्द्रासोऽवृ॒का अश्र॑मिष्ठाः। ते पा॒यवः॑ स॒ध्र्य॑ञ्चो नि॒षद्याग्ने॒ तव॑ नः पान्त्वमूर ॥१२॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 4 | Mantra No : 12
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : rakShohaa.agniH | Metre : nichRRitpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : asvapnajastaraNayaH sushevaa atandraaso.avRRikaa ashramiShThaaH. te paayavaH sadhrya~ncho niShadyaagne tava naH paantvamuura .12.
Component Words : asvapna.ajaH. taraNayaH. su.ashevaaH. atandraasaH. avRRikaaH. ashramiShThaaH. te. paayavaH. sadhrya~nchaH. ni.asadya. agne. tava. naH. paantu. amuura.12.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : रक्षोहाऽग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : अब प्रजाजनों के रक्षा विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : अस्व॑प्नऽजः। त॒रण॑यः। सु॒ऽशेवाः॑। अत॑न्द्रासः। अ॒वृ॒काः। अश्र॑मिष्ठाः। ते। पा॒यवः। स॒ध्र्य॑ञ्चः। नि॒ऽसद्य॑। अग्ने॑। तव॑। नः॒। पा॒न्तु॒। अ॒मू॒र॒॥१२॥
पदार्थ : हे (अमूर) मूर्खतादि दोषों से रहित (अग्ने) अग्नि सदृश तेजस्विन् राजन् ! जो जन (तव) आपके (अस्वप्नजः) जागनेवाले (तरणयः) युवावस्था को प्राप्त (अतन्द्रासः) आलस्य (अवृकाः) चोरीपन (अश्रमिष्ठाः) और अत्यन्त थकावट से रहित (सुशेवाः) उत्तम सुखयुक्त (सध्र्यञ्चः) साथ जाने वा सत्कार करने और (पायवः) पालन करनेवाले नौकर हैं (ते) वे (निषद्य) निरन्तर स्थित होकर (नः) हम लोगों की (पान्तु) रक्षा करें ॥१२॥
भावार्थ : प्रजाजनों को चाहिये कि सदा ही राजा को उपदेश देवें कि हे राजन् ! आपकी ओर से हम लोगों की रक्षा में धार्मिक आलस्यरहित पुरुषार्थी और बलवान् जन नियत हों ॥१२॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : रक्षोहाऽग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : अथ प्रजाजनरक्षाविषयमाह ॥
पदपाठ : अस्व॑प्नऽजः। त॒रण॑यः। सु॒ऽशेवाः॑। अत॑न्द्रासः। अ॒वृ॒काः। अश्र॑मिष्ठाः। ते। पा॒यवः। स॒ध्र्य॑ञ्चः। नि॒ऽसद्य॑। अग्ने॑। तव॑। नः॒। पा॒न्तु॒। अ॒मू॒र॒॥१२॥
पदार्थ : (अस्वप्नजः) जागरूकाः (तरणयः) तरुणावस्थां प्राप्ताः (सुशेवाः) सुसुखाः (अतन्द्रासः) अनलसाः (अवृकाः) अस्तेनाः (अश्रमिष्ठाः) अतिशयेनाऽश्रान्ताः श्रमरहिताः (ते) (पायवः) पालकाः (सध्र्यञ्चः) ये सहाञ्चन्ति ते (निषद्य) नितरां स्थित्वा (अग्ने) (तव) (नः) अस्मान् (पान्तु) रक्षन्तु (अमूर) मूढतादिदोषरहित ॥१२॥
अन्वय : हे अमूराऽग्ने राजन् ! ये तवाऽस्वप्नजस्तरणयोऽतन्द्रासोऽवृका अश्रमिष्ठाः सुशेवाः सध्र्यञ्चः पायवो भृत्याः सन्ति ते निषद्य नः पान्तु ॥१२॥
भावार्थ : प्रजाजनैः सदैव राजोपदेष्टव्यो हे राजन् ! भवतः सकाशादस्माकं रक्षणे धार्मिका अनलसा पुरुषार्थिनो बलवन्तो जना नियताः सन्त्विति ॥१२॥