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Rigveda / 4 / 5 / 6

इ॒दं मे॑ अग्ने॒ किय॑ते पाव॒कामि॑नते गु॒रुं भा॒रं न मन्म॑। बृ॒हद्द॑धाथ धृष॒ता ग॑भी॒रं य॒ह्वं पृ॒ष्ठं प्रय॑सा स॒प्तधा॑तु ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 5 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : वैश्वानरः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब अध्यापक विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : इ॒दम्। मे॒। अ॒ग्ने॒। किय॑ते। पा॒व॒क॒। अमि॑नते। गु॒रुम्। भा॒रम्। न। मन्म॑। बृ॒हत्। द॒धा॒थ॒। धृ॒ष॒ता। ग॒भी॒रम्। य॒ह्वम्। पृ॒ष्ठम्। प्रय॑सा। स॒प्तऽधा॑तु॥६॥

पदार्थ : हे (पावक) पवित्र करनेवाले (अग्ने) अग्ने के सदृश वर्त्तमान ! आप (कियते) थोड़े सामर्थ्य से युक्त (अमिनते) नहीं हिंसा करनेवाले (मे) मेरे लिये (गुरुम्) बड़े (भारम्) भार के (न) सदृश (मन्म) विज्ञान को तथा (धृषता) ढीठ और (प्रयसा) प्रसन्न[ता] के साथ (इदम्) इस (बृहत्) बढ़ानेवाले (गम्भीरम्) गम्भीर (पृष्ठम्) पूछने योग्य (यह्वम्) बड़े (सप्तधातु) सुवर्ण आदि सातों धातु जिसमें ऐसे धन को (दधाथ) धारण कीजिये ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अल्पज्ञ और विद्यार्थीजन ज्ञानी विद्वान् के समीप से विज्ञान और धन के साधन की याचना करते हैं, वे विद्वान् होते हैं ॥६॥