Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 5 / 10

अध॑ द्युता॒नः पि॒त्रोः सचा॒साम॑नुत॒ गुह्यं॒ चारु॒ पृश्नेः॑। मा॒तुष्प॒दे प॑र॒मे अन्ति॒ षद्गोर्वृष्णः॑ शो॒चिषः॒ प्रय॑तस्य जि॒ह्वा ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 5 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : वैश्वानरः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अध॑। द्यु॒ता॒नः। पि॒त्रोः। सचा॑। आ॒सा। अम॑नुत। गुह्य॑म्। चारु॑। पृश्नेः॑। मा॒तुः। प॒दे। प॒र॒मे। अन्ति॑। सत्। गोः। वृष्णः॑। शो॒चिषः॑। प्रऽय॑तस्य। जि॒ह्वा॥१०॥

पदार्थ : हे जिज्ञासुजनो ! (अध) इसके अनन्तर जो (पित्रोः) माता और पिता की उत्तेजना से (द्युतानः) प्रकाशमान (सचा) सत्य (आसा) मुख से (परमे) उत्तम (मातुः) माता के सदृश वर्त्तमान के (पदे) प्राप्त होने योग्य स्थान में (अन्ति) समीप (सत्) वर्त्तमान (गोः) गौ और (वृष्णः) वृष्टि करनेवाले के सदृश (शोचिषः) प्रकाशमान (प्रयतस्य) प्रयत्न करते हए की (जिह्वा) वाणी के सदृश जो (पृश्नेः) अन्तरिक्ष के मध्य में (चारु) सुन्दर (गुह्यम्) गुप्त है, उस जीवस्वरूप को (अमनुत) जानिये ॥१०॥

भावार्थ : जैसे अन्तरिक्ष और पृथिवी के मध्य में वर्त्तमान सूर्य्य उत्तम प्रकार शोभित है और जैसे विद्वान् की वाणी विद्या का प्रकाश करनेवाली है और जैसे अन्तरिक्ष किसी से भी दूर नहीं है, वैसे ही उत्तम अपना आत्मारूप वस्तु और परमात्मा समीप में वर्त्तमान है, ऐसा जानना चाहिये ॥१०॥