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Rigveda / 1 / 28 / 2

यत्र॒ द्वावि॑व ज॒घना॑धिषव॒ण्या॑ कृ॒ता। उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 28 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : शुनःशेप आजीगर्तिः | देवता : इन्द्रयज्ञसोमाः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदपाठ : यत्र॑। द्वौऽइ॑व। ज॒घना॑। अ॒धि॒ऽस॒व॒न्या॑। कृ॒ता। उ॒लूख॑लऽसुतानाम्। अव॑। इत्। ऊँ॒ इति॑। इ॒न्द्र॒। ज॒ल्गु॒लः॒॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) भीतर बाहर के शरीर साधनों से ऐश्वर्यवाले विद्वान् मनुष्य ! तुम (द्वाविव) (जघना) दो जङ्घाओं के समान (यत्र) जिस व्यवहार में (अधिषवण्या) अच्छे प्रकार वा असार अलग-अलग करने के पात्र अर्थात् शिलबट्टे होते हैं, उनको (कृता) अच्छे प्रकार सिद्ध करके (उलूखलसुतानाम्) शिलबट्टे से शुद्ध किये हुए पदार्थों के सकाश से सार को (अव) प्राप्त हो (उ) और उत्तम विचार से (इत्) उसी को (जल्गुलः) बार-बार पदार्थों पर चला॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जैसे दोनों जांघों के सहाय से मार्ग का चलना-चलाना सिद्ध होता है, वैसे ही एक तो पत्थर की शिला नीचे रक्खें और दूसरा ऊपर से पीसने के लिये बट्टा जिसको हाथ में लेकर पदार्थ पीसे जायें, इनसे औषधि आदि पदार्थों को पीसकर यथावत् भक्ष्य आदि पदार्थों को सिद्ध करके खावें। यह भी दूसरा साधन उखली मुसल के समान बनाना चाहिये॥२॥