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Rigveda / 4 / 6 / 4

स्ती॒र्णे ब॒र्हिषि॑ समिधा॒ने अ॒ग्ना ऊ॒र्ध्वो अ॑ध्व॒र्युर्जु॑जुषा॒णो अ॑स्थात्। पर्य॒ग्निः प॑शु॒पा न होता॑ त्रिवि॒ष्ट्ये॑ति प्र॒दिव॑ उरा॒णः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 6 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : स्ती॒र्णे। ब॒र्हिषि॑। स॒म्ऽइ॒धा॒ने। अ॒ग्नौ। ऊ॒र्ध्वः। अ॒ध्व॒र्युः। जु॒जु॒षा॒णः। अ॒स्था॒त्। परि॑। अ॒ग्निः। प॒शु॒ऽपाः। न। होता॑। त्रि॒ऽवि॒ष्टि। ए॒ति॒। प्र॒ऽदिवः॑। उ॒राणः॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (समिधाने) प्रदीप्त (बर्हिषि) अन्तरिक्ष में वा (स्तीर्णे) आच्छादित (अग्नौ) सूर्य्यरूप अग्नि में (उराणः) बहुत कार्य्य करता हुआ (ऊर्ध्वः) उत्तम (अग्निः) सूर्य्याग्नि (परि, अस्थात्) सब ओर से स्थित हो वा (त्रिविष्टि) आकाश में (प्रदिवः) उत्तम प्रकाशों को (एति) प्राप्त होता है (पशुपाः) पशुओं की रक्षा करनेवाले के (न) सदृश (होता) यज्ञ करानेवाला है, वैसे ही (जुजुषाणः) सेवा करते हुए (अध्वर्युः) अपने को अहिंसनीय व्यवहार की इच्छा करनेवाले वर्त्ताव करो ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो लोग अहिंसा आदि कर्म्मों को कर और विद्वान् होकर परोपकारी हों, वे अन्तरिक्ष में सूर्य्य के सदृश उत्तम प्रकार प्रकाशित होवें ॥४॥