Rigveda / 4 / 9 / 4
उ॒त ग्ना अ॒ग्निर॑ध्व॒र उ॒तो गृ॒हप॑ति॒र्दमे॑। उ॒त ब्र॒ह्मा नि षी॑दति ॥४॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 9 | Mantra No : 4
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : agniH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : uta gnaa agniradhvara uto gRRihapatirdame. uta brahmaa ni Shiidati .4.
Component Words : uta. gnaaH. agniH. adhvare. uto iti. gRRiha.apatiH. dame. uta. brahmaa. ni. siidati.4.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अब विद्वानों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : उ॒त। ग्नाः। अ॒ग्निः। अ॒ध्व॒रे। उ॒तो इति॑। गृ॒हऽप॑तिः। दमे॑। उ॒त। ब्र॒ह्मा। नि। सी॒द॒ति॒॥४॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (गृहपतिः) गृह का स्वामी (अग्निः) अग्नि के सदृश (ग्नाः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियों को (नि, सीदति) प्राप्त होता (उत) और (ब्रह्मा) चार वेद का पढ़नेवाला होता हुआ (अध्वरे) नहीं हिंसा करने योग्य दमनयुक्त (दमे) गृह में स्थित होता है (उतो) और कर्म्म करता और (उत) भी सब को बोध कराता है, वही सत्कार करने योग्य होता है, ऐसा जानो ॥४॥
भावार्थ : जो मनुष्य अग्नि के सदृश पवित्र विद्यावाले और चारों वेदों के ज्ञाता और भी उत्तम कर्म्मों के करनेवाले गृह के स्वामी होवें, वे ही श्रेष्ठ अधिकारों में वर्त्तमान होवें ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अथ विद्वद्गुणानाह ॥
पदपाठ : उ॒त। ग्नाः। अ॒ग्निः। अ॒ध्व॒रे। उ॒तो इति॑। गृ॒हऽप॑तिः। दमे॑। उ॒त। ब्र॒ह्मा। नि। सी॒द॒ति॒॥४॥
पदार्थ : (उत) अपि (ग्नाः) सुशिक्षिता वाचः (अग्निः) पावक इव (अध्वरे) अहिंसनीये (उतो) अपि (गृहपतिः) (दमे) दान्ते गृहे (उत) (ब्रह्मा) (नि) (सीदति) ॥४॥
अन्वय : हे मनुष्याः ! यो गृहपतिरग्निरिव ग्ना निषीदति उत ब्रह्मा सन्नध्वरे दमे निषीदति उतो कर्म्म करोति उतापि सर्वान् बोधयति स एव सत्कर्त्तव्यो भवतीति विजानीत ॥४॥
भावार्थ : ये मनुष्या पावकवत्पवित्रविद्या उतापि चतुर्वेदविदः प्रशस्तकर्म्मकर्त्तारो गृहस्वामिनस्स्युस्त एवोत्तमाऽधिकारेषु निषीदन्तु ॥४॥