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Rigveda / 4 / 17 / 5

य एक॒ इच्च्या॒वय॑ति॒ प्र भूमा॒ राजा॑ कृष्टी॒नां पु॑रुहू॒त इन्द्रः॑। स॒त्यमे॑न॒मनु॒ विश्वे॑ मदन्ति रा॒तिं दे॒वस्य॑ गृण॒तो म॒घोनः॑ ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 17 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यः। एकः॑। इत्। च्य॒वय॑ति। प्र। भू॑म। राजा॑। कृ॒ष्टी॒नाम्। पु॒रु॒ऽहू॒तः। इन्द्रः॑। स॒त्यम्। ए॒न॒म्। अनु॑। विश्वे॑। म॒द॒न्ति॒। रा॒तिम्। दे॒वस्य॑। गृ॒ण॒तः। म॒घोनः॑ ॥५॥

पदार्थ : (यः) जो (पुरुहूतः) बहुतों से बुलाया और प्रशंसा किया गया (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्यवान् (कृष्टीनाम्) क्षेत्र बोनेवाले आदि प्रजास्थ मनुष्यों का (राजा) उत्तम गुणों से प्रकाशमान राजा (एकः) एक (इत्) ही शत्रुओं को (प्र, च्यावयति) कम्पाता है उसको (मघोनः) बहुत धन से युक्त श्रेष्ठ पुरुषों के समूह के मध्य में (गृणतः) सम्पूर्ण विद्या की स्तुति करते हुए (देवस्य) दिव्यगुणी विद्वानों के समूह में वर्त्तमान (सत्यम्) श्रेष्ठों में साधु (रातिम्) दाता जन को (विश्वे) सम्पूर्ण विद्वान् सभासद् (अनु, मदन्ति) अनुमति देते हैं उस (एनम्) इसको राजा करके हम लोग सुखी (भूम) होवें ॥५॥

भावार्थ : वही राजा हो सकता है, जो एक भी बहुत शत्रुओं को जीत सकता है और वही विजयी होता है, जो श्रेष्ठ पुरुषों के सङ्ग और उपदेश को प्राप्त होकर धर्मयुक्त न्याय निरन्तर करता है ॥५॥