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Rigveda / 4 / 20 / 5

वि यो र॑र॒प्श ऋषि॑भि॒र्नवे॑भिर्वृ॒क्षो न प॒क्वः सृण्यो॒ न जेता॑। मर्यो॒ न योषा॑म॒भि मन्य॑मा॒नोऽच्छा॑ विवक्मि पुरुहू॒तमिन्द्र॑म् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 20 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : वि। यः। र॒र॒प्शे। ऋषि॑ऽभिः। नवेभिः॑। वृ॒क्षः। न। प॒क्वः। सृण्यः॑। न। जेता॑। मर्यः॑। न। योषा॑म्। अ॒भि। मन्य॑मानः। अच्छ॑। वि॒व॒क्मि॒। पु॒रु॒ऽहू॒तम्। इन्द्र॑म् ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (नवेभिः) नवीन अध्ययनकर्त्ता (ऋषिभिः) वेदार्थ के जाननेवालों से (वि, ररप्शे) स्तुति किये जाते हो (वृक्षः) वृक्ष के (न) सदृश (पक्वः) पके हुए फल आदि युक्त (सृण्यः) बल को प्राप्त उत्तम प्रकार शिक्षित सेना के (न) सदृश (जेता) जीतनेवाला (मर्य्यः) मनुष्य (योषाम्) स्त्री के (न) तुल्य प्रजा को (अभि, मन्यमानः) प्रत्यक्ष जानता हुआ वर्तमान है, उस (पुरुहूतम्) बहुतों से स्तुति किये गये (इन्द्रम्) प्रशंसित गुणों के धारण करनेवाले को जैसे मैं (अच्छा) उत्तम प्रकार (विवक्मि) विशेष करके उपदेश करता हूँ, वैसे इसको आप लोग भी उपदेश दीजिये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो यथार्थवक्ता जनों में प्रशंसा को प्राप्त, वृक्ष के सदृश दृढ़ उत्साहरूप फलवान्, अकेला सेना के सदृश जीतनेवाला, पतिव्रता स्त्री के सदृश प्रजा में प्रसन्न होवे, उस प्रशंसित को राजा आप लोग मानो ॥५॥