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Rigveda / 4 / 20 / 9

कया॒ तच्छृ॑ण्वे॒ शच्या॒ शचि॑ष्ठो॒ यया॑ कृ॒णोति॒ मुहु॒ का चि॑दृ॒ष्वः। पु॒रु दा॒शुषे॒ विच॑यिष्ठो॒ अंहोऽथा॑ दधाति॒ द्रवि॑णं जरि॒त्रे ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 20 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब विद्वानों के उपदेशगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : कया॑। तत्। शृ॒ण्वे॒। शच्या॑। शचि॑ष्ठः। यया॑। कृणोति॑। मुहु॑। का। चि॒त्। ऋ॒ष्वः। पु॒रु। दा॒शुषे॑। विऽच॑यिष्ठः। अंहः॑। अथ॑। द॒धा॒ति॒। द्रवि॑णम्। ज॒रि॒त्रे ॥९॥

पदार्थ : हे राजन् ! जैसे (शचिष्ठः) अत्यन्त बुद्धिमान् (विचयिष्ठः) अत्यन्त वियोग करनेवाला (ऋष्वः) बड़ा विद्वान् (अंहः) अपराध को पृथक् करके (अथा) अनन्तर (जरित्रे) स्तुति करने और (दाशुषे) देनेवाले के लिये (पुरु) बहुत (द्रविणम्) धन को (दधाति) धारण करता है और जिन (का) किन्हीं (चित्) भी उत्तम कर्म्मों को (यया) जिस (कया) किसी (शच्या) बुद्धि वा क्रिया से (मुहु) बार-बार (कृणोति) सिद्ध करता है (तत्) उन्हें उससे (शृण्वे) सुनूँ ॥९॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों की योग्यता है कि जैसे यथार्थवक्ता जन पापों का त्याग, धर्म्म का आचरण और यथार्थ ज्ञानस्वरूप ज्ञान को धारण करके जगत् के कल्याण के लिये बहुत ज्ञान को फैलाते हैं, वैसे ही आप लोग आचरण करो ॥९॥