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Rigveda / 4 / 21 / 5

उप॒ यो नमो॒ नम॑सि स्तभा॒यन्निय॑र्ति॒ वाचं॑ ज॒नय॒न्यज॑ध्यै। ऋ॒ञ्ज॒सा॒नः पु॑रु॒वार॑ उ॒क्थैरेन्द्रं॑ कृण्वीत॒ सद॑नेषु॒ होता॑ ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 21 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : उप॑। यः। नमः॑। नम॑सि। स्त॒भा॒यन्। इय॑र्ति। वाच॑म्। ज॒नय॑न्। यज॑ध्यै। ऋ॒ञ्ज॒सा॒नः। पु॒रु॒ऽवारः॑। उ॒क्थैः। आ। इन्द्र॑म्। कृ॒ण्वी॒त॒। सद॑नेषु। होता॑ ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (यजध्यै) मेल करने को (वाचम्) उत्तम शिक्षायुक्त वाणी (जनयन्) प्रकट करता हुआ (उक्थैः) प्रशंसित कर्म्मों से (ऋञ्जसानः) अत्यन्त सिद्ध करता हुआ (पुरुवारः) बहुतों से स्वीकार किया गया (होता) न्याय को देनेवाला (सदनेषु) न्याय के स्थानों में (नमसि) अन्न वा सत्कार के निमित्त (नमः) अन्न को (उप, स्तभायन्) स्तम्भित अर्थात् रोकता हुआ (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य को (आ, कृण्वीत) सिद्ध करे, वह अन्न और सत्कार को (इयर्त्ति) प्राप्त होता है ॥५॥

भावार्थ : जो राजा विद्या और उत्तम शिक्षा से युक्त नीति को प्रकट करता, सत्कार करने के योग्यों का सत्कार करता, दुष्टों को दण्ड देता और प्रयत्न करता हुआ राज्य के पालन से ऐश्वर्य्य की उन्नति करता है, वही सर्वत्र सत्कृत होता है ॥५॥