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Rigveda / 4 / 22 / 4

विश्वा॒ रोधां॑सि प्र॒वत॑श्च पू॒र्वीर्द्यौर्ऋ॒ष्वाज्जनि॑मन्नेजत॒ क्षाः। आ मा॒तरा॒ भर॑ति शु॒ष्म्या गोर्नृ॒वत्परि॑ज्मन्नोनुवन्त॒ वाताः॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 22 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब पृथिवी के धारण [और] भ्रमणविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : विश्वा॑। रोधां॑सि। प्र॒ऽवतः॑। च॒। पू॒र्वीः। द्यौः। ऋ॒ष्वात्। जनि॑मन्। रे॒ज॒त॒। क्षाः। आ। मा॒तरा॑। भर॑ति। शु॒ष्मी। आ। गोः। नृ॒ऽवत्। परि॑ऽज्मन्। नो॒नु॒व॒न्त॒। वाताः॑ ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (ऋष्वात्) बड़े प्रकृतिरूप कारण से (जनिमन्) उत्पत्ति में प्रकट हुई (पूर्वीः) प्राचीनकाल से सिद्ध क्रियाओं को (द्यौः) बिजुली और (क्षाः) पृथिवी (आ, भरति) अच्छे प्रकार धारण करती है (च) और (प्रवतः) नीचे के स्थल में वर्त्तमान (विश्वा) सम्पूर्ण प्रजाओं तथा (रोधांसि) रुकावटों को (नृवत्) मनुष्यों के सदृश (आ) अच्छे प्रकार धारण करती है और जो (शुष्मी) बलवान् अग्नि (गोः) पृथिवी के सम्बन्ध में (मातरा) माता और पितारूप राजा और प्रजाजन तथा अन्तरिक्ष और पृथिवी को मनुष्यों के सदृश (रेजत) कम्पाता है, जहाँ (परिज्मन्) सब ओर से व्याप्त अन्तरिक्ष वा विस्तृत भूमि में (वाताः) पवन (नोनुवन्त) अत्यन्त शब्द करते हैं, उनको आप लोग जानो ॥४॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो प्रकृतिरूप कारण से उत्पन्न हुआ बड़ा अग्नि सम्पूर्ण भूगोलों का आकर्षण करता है, माता और पिता के सदृश सब का पालन करता और अन्तरिक्ष में घुमाता है, उसको जान के कार्य्य सिद्ध करो ॥४॥