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Rigveda / 4 / 23 / 11

नू ष्टु॒त इ॑न्द्र॒ नू गृ॑णा॒न इषं॑ जरि॒त्रे न॒द्यो॒३॒॑ न पी॑पेः। अका॑रि ते हरिवो॒ ब्रह्म॒ नव्यं॑ धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः ॥११॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 23 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर प्रशंसापरत्व से पूर्व विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : नु। स्तु॒तः। इ॒न्द्र॒। नु। गृ॒णा॒नः। इष॑म्। ज॒रि॒त्रे। न॒द्यः॑। न। पी॒पेरिति॑ पीपेः। अका॑रि। ते॒। ह॒रि॒ऽवः॒। ब्रह्म॑। नव्य॑म्। धि॒या। स्या॒म॒। र॒थ्यः॑। स॒दाऽसाः ॥११॥

पदार्थ : हे (हरिवः) बहुत धनयुक्त (इन्द्र) सत्य ऐश्वर्य्य के देनेवाले जिस (ते) आपका (नव्यम्) नवीन (ब्रह्म) बड़ा विद्यारूप धन जिसने (अकारि) किया उस (जरित्रे) विद्या की इच्छा करनेवाले के लिये (स्तुतः) सत्य आचरण से प्रशंसित (नद्यः) नदियों के (न) सदृश (इषम्) विज्ञान को देकर (नु) शीघ्र (पीपेः) पालन करे और सत्य का (गृणानः) प्रचार करता हुआ धर्म्म को प्राप्त कराय के (नु) निश्चय पालन करो और जैसे हम लोग (धिया) बुद्धि से और पुरुषार्थ से (रथ्यः) रथयुक्त और (सदासाः) दासों के सहित वर्त्तमान (स्याम) होवें, वैसे आप हूजिये ॥११॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो जैसे आप लोगों में धर्म्मयुक्त नीति का स्थापन करें, उनकी सेवा करके मित्र हो के सम्पूर्ण विद्याओं को जानिये ॥११॥ इस सूक्त में प्रश्न उत्तर मैत्री शत्रुओं का निवारण सेना की उन्नति और सत्य आचरण की उत्तमता का वर्णन करने से इस के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥११॥ यह तेईसवाँ सूक्त और दशमा वर्ग समाप्त हुआ ॥