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Rigveda / 4 / 24 / 9

भूय॑सा व॒स्नम॑चर॒त्कनी॒योऽवि॑क्रीतो अकानिषं॒ पुन॒र्यन्। स भूय॑सा॒ कनी॑यो॒ नारि॑रेचीद्दी॒ना दक्षा॒ वि दु॑हन्ति॒ प्र वा॒णम् ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 24 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब ज्येष्ठ-कनिष्ठ के व्यवहार विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : भूय॑सा। व॒स्नम्। अ॒च॒र॒त्। कनी॑यः। अवि॑ऽक्रीतः। अ॒का॒नि॒ष॒म्। पुनः॑। यन्। सः। भूय॑सा। कनी॑यः। न। अ॒रि॒रे॒ची॒त्। दी॒नाः। दक्षाः॑। वि। दु॒ह॒न्ति॒। प्र। वा॒णम् ॥९॥

पदार्थ : जो (अविक्रीतः) नहीं बेचा गया (भूयसा) बहुत प्रकार से (कनीयः) अत्यन्त अल्प (वस्नम्) हट्टस्रस्तर अर्थात् हटिया में बिछाने का (अचरत्) आचरण करे (सः) वह (पुनः) फिर (यन्) जाता हुआ (भूयसा) बहुत भाव से (कनीयः) अत्यन्त न्यून कर्म को (न) नहीं (अरिरेचीत्) रीता करे और जो (दीनाः) क्षीण (दक्षाः) चतुर जन (वाणम्) वाणी को (वि, प्र, दुहन्ति) अच्छे प्रकार पूरित करते हैं, उनको मैं (अकानिषम्) प्रदीप्त करूँ और कामना करूँ ॥९॥

भावार्थ : जो मनुष्य अनेक प्रकार के व्यापार करनेवाले, अभिमानरहित, बुद्धिमान् हुए, विद्या और शिक्षा से पूर्ण वाणी को करते हैं, वे छोटों को पाल सकते हैं ॥९॥