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Rigveda / 4 / 26 / 6

ऋ॒जी॒पी श्ये॒नो दद॑मानो अं॒शुं प॑रा॒वतः॑ शकु॒नो म॒न्द्रं मद॑म्। सोमं॑ भरद्दादृहा॒णो दे॒वावा॑न्दि॒वो अ॒मुष्मा॒दुत्त॑रादा॒दाय॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 26 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : ऋ॒जी॒पी। श्ये॒नः। दद॑मानः। अंशु॒म्। प॒रा॒ऽवतः॑। श॒कु॒नः। म॒न्द्रम्। मद॑म्। सोम॑म्। भ॒र॒त्। द॒दृ॒हा॒णः। दे॒वऽवा॑न्। दि॒वः। अ॒मुष्मा॑त्। उत्ऽत॑रात्। आ॒ऽदाय॑ ॥६॥

पदार्थ : हे राजन् ! जैसे (ऋजीपी) सीधी चालवाला (श्येनः) बढ़े हुए वेग से युक्त (शकुनः) पक्षी (परावतः) दूर देश से गिर के अपने अपेक्षित पदार्थ को (भरत्) धारण करता है, वैसे ही आप (अंशुम्) विज्ञान आदि पदार्थ (मदम्) आनन्द करनेवाले (मन्द्रम्) प्रशंसा करने योग्य (सोमम्) ऐश्वर्य्य को (ददमानः) देते हुए (देवावान्) बहुत विद्वानों से युक्त (अमुष्मात्) परोक्ष (उत्तरात्) आनेवाले (दिवः) बिजुली के प्रकाश से विद्या को (आदाय) ग्रहण करके (दादृहाणः) बढ़ते हुए होवें ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे पक्षी पृथिवी से उड़ के अन्तरिक्ष के मार्ग से जाकर और आकर अपने प्रयोजन को सिद्ध करते हैं, वैसे ही देश-देशान्तर में विमान आदि से जाकर अपने प्रयोजन को सिद्ध करो ॥६॥