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Rigveda / 4 / 27 / 4

ऋ॒जि॒प्य ई॒मिन्द्रा॑वतो॒ न भु॒ज्युं श्ये॒नो ज॑भार बृह॒तो अधि॒ ष्णोः। अ॒न्तः प॑तत्पत॒त्र्य॑स्य प॒र्णमध॒ याम॑नि॒ प्रसि॑तस्य॒ तद्वेः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 27 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : ऋ॒जि॒प्यः। ई॒म्। इन्द्र॑ऽवतः। न। भु॒ज्युम्। श्ये॒नः। ज॒भा॒र॒। बृ॒ह॒तः। अधि॑। स्नोः। अ॒न्तरिति॑। प॒त॒त्। प॒त॒त्रि। अ॒स्य॒। प॒र्णम्। अध॑। याम॑नि। प्रऽसि॑तस्य। तत्। वेरिति॒ वेः ॥४॥

पदार्थ : जो (ऋजिप्यः) सरल मार्ग चलनेवालों में श्रेष्ठ मनुष्य (श्येनः) वाज पक्षी के सदृश (बृहतः) बड़े (स्नोः) प्रकाशमान पुरुषार्थ से (इन्द्रावतः) ऐश्वर्य्य से युक्तों को (न) जैसे वैसे (भुज्युम्) भोग करनेवाले को (अधि, जभार) अधिक धारण करता है (अस्य) इसका (पर्णम्) पत्र (यामनि) मार्ग में और (प्रसितस्य) बँधे हुए (वेः) पक्षी का जो (पतत्रि) गिरनेवाला पत्र (अन्तः) मध्य में (पतत्) गिरता है (तत्) उसको (जभार) धारण करता है वह (अध) इसके अनन्तर (ईम्) सब प्रकार से आनन्द को प्राप्त होवे ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे वाज पक्षी अपने पुरुषार्थ से बहुत भोग को प्राप्त होता और शीघ्र चलता है, वैसे ही पुरुषार्थ करनेवाले जन बहुत सुख को प्राप्त होते हैं ॥४॥