Rigveda / 4 / 31 / 15
अ॒स्माक॑मुत्त॒मं कृ॑धि॒ श्रवो॑ दे॒वेषु॑ सूर्य। वर्षि॑ष्ठं॒ द्यामि॑वो॒परि॑ ॥१५॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 31 | Mantra No : 15
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : indra: | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : asmaakamuttama.m kRRidhi shravo deveShu suurya. varShiShTha.m dyaamivopari .15.
Component Words : asmaakam. ut.atamam. kRRidhi. shravaH. deveShu. suurya. varShiShTham. dyaam.aiva. upari .15.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : अ॒स्माक॑म्। उ॒त्ऽत॒मम्। कृ॒धि॒। श्रवः॑। दे॒वेषु॑। सू॒र्य॒। वर्षि॑ष्ठम्। द्याम्ऽइ॑व। उ॒परि॑ ॥१५॥
पदार्थ : हे (सूर्य्य) सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान राजन् ! आप (उपरि) ऊपर वर्त्तमान (द्यामिव) प्रकाश के सदृश (अस्माकम्) हम लोगों के (उत्तमम्) अत्यन्त श्रेष्ठ (वर्षिष्ठम्) अत्यन्त बड़े हुए (श्रवः) अन्न आदि वा श्रवण को (देवेषु) विद्वानों में (कृधि) करिये ॥१५॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे आकाश में सूर्य्य बड़ा है, वैसे ही विद्या और विनय की उन्नति से उत्तम ऐश्वर्य्य को उत्पन्न करो ॥१५॥ इस सूक्त में राजा और प्रजा के धर्म वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१५॥ यह कतीसवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : अ॒स्माक॑म्। उ॒त्ऽत॒मम्। कृ॒धि॒। श्रवः॑। दे॒वेषु॑। सू॒र्य॒। वर्षि॑ष्ठम्। द्याम्ऽइ॑व। उ॒परि॑ ॥१५॥
पदार्थ : (अस्माकम्) (उत्तमम्) अतिश्रेष्ठम् (कृधि) कुरु (श्रवः) अन्नादिकं श्रवणं वा (देवेषु) विद्वत्सु (सूर्य्य) सूर्य इव वर्त्तमान (वर्षिष्ठम्) अतिशयेन वृद्धम् (द्यामिव) प्रकाशमिव (उपरि) ऊर्ध्वं वर्त्तमानम् ॥१५॥
अन्वय : हे सूर्य्य राजँस्त्वमुपरि द्यामिवाऽस्माकमुत्तमं वर्षिष्ठं श्रवो देवेषु कृधि ॥१५॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः । हे मनुष्या ! यथाऽऽकाशे सूर्य्यो महानस्ति तथैव विद्याविनयोन्नत्या सर्वोत्कृष्टमैश्वर्य्यं जनयतेति ॥१५॥ अत्र राजप्रजाधर्मवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥१५॥ इत्येकत्रिंशत्तमं षड्विंशो वर्गश्च समाप्तः ॥