Rigveda / 1 / 30 / 16
शश्व॒दिन्द्रः॒ पोप्रु॑थद्भिर्जिगाय॒ नान॑दद्भिः॒ शाश्व॑सद्भि॒र्धना॑नि। स नो॑ हिरण्यर॒थं दं॒सना॑वा॒न्त्स नः॑ सनि॒ता स॒नये॒ स नो॑ऽदात्॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 30 | Mantra No : 16
In English:
Seer : shunaHshepa aajiigartiH | Devta : indra: | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : shashvadindraH popruthadbhirjigaaya naanadadbhiH shaashvasadbhirdhanaani. sa no hiraNyaratha.m da.msanaavaantsa naH sanitaa sanaye sa no.adaat.
Component Words : shashvat. indraH. popruthat.abhiH. jigaaya. naanadat.abhiH. shaashvasat.abhiH. dhanaani. saH. naH. hiraNya.aratham. da.msanaa.a vaan. saH. naH. sanitaa. sanaye. saH. naH. adaat.
In Hindi:
ऋषि : शुनःशेप आजीगर्तिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर वह सभाध्यक्ष कैसा और क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदपाठ : शश्व॑त्। इन्द्रः॑। पोप्रु॑थत्ऽभिः। जि॒गा॒य॒। नान॑दत्ऽभिः। शाश्व॑सत्ऽभिः। धना॑नि। सः। नः॒। हि॒र॒ण्य॒ऽर॒थम्। दं॒सना॑ऽ वान्। सः। नः॒। स॒नि॒ता। स॒नये॑। सः। नः॒। अ॒दा॒त्॥
पदार्थ : (इन्द्रः) जगत् का रचनेवाला ईश्वर (शश्वत्) अनादि सनातन कारण से (नानदद्भिः) तड़फ और गर्जना आदि शब्दों को करती हुई बिजली और नदी अचेतन और जीव तथा (शाश्वसद्भिः) अति प्रशंसनीय प्राणवाले चर वा (पोप्रुथद्भिः) स्थूल जो कि अचर हैं, उन कार्य्यरूपी पदार्थों से (धनानि) पृथिवी सुवर्ण और विद्या आदि धनों को (जिगाय) प्रकर्षता अर्थात् उन्नति को प्राप्त करता है (सः) वह (दंसनावान्) कर्मों का फल देने हारा और साधनों से संयुक्त ईश्वर (नः) हमारे लिये (हिरण्यरथम्) ज्योतिवाले सूर्य आदि लोक वा सुवर्ण आदि पदार्थों के प्राप्त करानेवाले पदार्थों को और विमान आदि रथों को (अदात्) प्रत्यक्ष करता है (सः) (नः) हम को सुखों के (सनये) भोग के लिये (सनिता) विद्या, कर्म और उपदेश से विभाग करनेवाला होकर सब सुखों को (अदात्) देता है, वैसा सभा, सेनापति और न्यायाधीश भी वर्तें॥१६॥
भावार्थ : जैसे जगदीश्वर सनातन कारण से चर और अचर कार्यों को उत्पन्न करके इन्हीं से सब जीवों को सुख देता है, वैसे सभा, सेनापति, न्यायाधीश लोग सब सभा, सेना और न्याय के अङ्गों को सिद्ध कर सब प्रजा को निरन्तर आनन्दयुक्त करते हैं, जैसे इससे और कोई संसार का रचने वा कर्म फल का देने और ठीक न्याय से राज्य का पालन करनेवाला नहीं हो सकता, वैसे वे भी सब कार्य्य करें॥१६॥
In Sanskrit:
ऋषि : शुनःशेप आजीगर्तिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनः स सभाध्यक्षः कीदृशः किं करोतीत्युपदिश्यते॥
पदपाठ : शश्व॑त्। इन्द्रः॑। पोप्रु॑थत्ऽभिः। जि॒गा॒य॒। नान॑दत्ऽभिः। शाश्व॑सत्ऽभिः। धना॑नि। सः। नः॒। हि॒र॒ण्य॒ऽर॒थम्। दं॒सना॑ऽ वान्। सः। नः॒। स॒नि॒ता। स॒नये॑। सः। नः॒। अ॒दा॒त्॥
पदार्थ : (शश्वत्) अनादिस्वरूपाज्जगत्कारणात् (इन्द्रः) सृष्टिकर्त्तेश्वरः राज्यशास्ता (पोप्रुथद्भिः) अतिशयेन स्थूलैरचरैः कार्यैः। अत्र प्रोथृ पर्याप्तावित्यस्माद् यङ्लुगन्ताच्छतृप्रत्यय उपधाया उत्वं च वर्णव्यत्ययेन (जिगाय) जयति प्रकर्षतां प्रापयति। अत्र लडर्थे लिट्। (नानदद्भिः) अतिशयेनाव्यक्तशब्दं कुर्वद्भिर्जीवैर्विद्युदादिभिर्वा (शाश्वसद्भिः) अतिशयेन प्राणवद्भिश्चरैः (धनानि) पृथिवीसुवर्णविद्यादीनि (सः) उक्तार्थः (नः) अस्मभ्यम् (हिरण्यरथम्) हिरण्यानां ज्योतिर्मयानां सूर्यादीनां लोकानां सुवर्णादीनां वा रथो देशान्तरप्रापणो यानसमूहः। अत्र रथ इति रमु क्रीडायामित्यस्य रूपं रमधातो रूपं वा। (दंसनावान्) दंसः कर्म आचष्टेऽनया सा दंसना। सा बह्वी विद्यते यस्य सः। दंस इति कर्मनामसु पठितम्। (निघं०२.१) अस्मात् तत्करोति तदाचष्टे इति णिच् ततो ण्यासश्रन्थो युच् इति युच् ततो भूम्न्यर्थे मतुप्। (सः) सर्वेषां जीवानां पापपुण्यफलानां विभागदाता (नः) अस्माकम् (सनिता) विद्याकर्मोपदेशेन सम्भाजिता (सनये) सुखानां सम्भोगाय (सः) उक्तार्थः (नः) अस्मभ्यम् (अदात्) दत्तवान्। ददाति दास्यति वा। अत्र छन्दसि लुङ्लङ्लिटः इति सामान्यकाले लुङ्॥१६॥
अन्वय : इन्द्रो जगदीश्वरः शश्वत् शश्वतोऽनादेः कारणात् नानदद्भिः शाश्वसद्भिः पोप्रुथद्भिः कार्यैर्द्रव्यैर्जिगाय जयति स दंसनावानीश्वरो नोऽस्मभ्यं हिरण्यरथमदाद् ददाति दास्यति स नोऽस्माकं सनये सुखानां सनिता सर्वाणि सुखान्यदादिव सभासेनापतिर्वर्त्तेत॥१६॥
भावार्थ : यथा जगदीश्वरः सनातनाज्जगत्कारणाच्चराचराणि कार्याण्युत्पाद्यैतैः सर्वेभ्यो जीवेभ्यस्सर्वाणि सुखानि ददाति तथा सभासेनापतिर्न्यायाधीशाः सर्वाणि सभासेनान्यायाङ्गानि निष्पाद्य सर्वाः प्रजा निरन्तरमानन्दयेयुः यथा नैतस्माद्भिन्नः कश्चिज्जगत्स्रष्टा कर्मफलप्रदाता राज्यप्रशास्ता च भवितुमर्हति तथैव सर्वमेतदनुतिष्ठेरन्॥१६॥