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Rigveda / 4 / 36 / 2

रथं॒ चे च॒क्रुः सु॒वृतं॑ सु॒चेत॒सोऽवि॑ह्वरन्तं॒ मन॑स॒स्परि॒ ध्यया॑। ताँ ऊ॒ न्व१॒॑स्य सव॑नस्य पी॒तय॒ आ वो॑ वाजा ऋभवो वेदयामसि ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 36 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : ऋभवः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : रथ॑म्। ये। च॒क्रुः। सु॒ऽवृत॑म्। सु॒ऽचेत॑सः। अवि॑ऽह्वरन्तम्। मन॑सः। परि॑। ध्यया॑। तान्। ऊ॒म् इति॑। नु। अ॒स्य। सव॑नस्य। पी॒तये॑। आ। वः॒। वा॒जाः॒। ऋ॒भ॒वः॒। वे॒द॒या॒म॒सि॒ ॥२॥

पदार्थ : हे (वाजाः) हस्तक्रिया को प्राप्त हुए (ऋभवः) बुद्धिमानो ! (ये) जो (वः) आप लोगों को (अस्य) इस (सवनस्य) शिल्पविद्या से उत्पन्न हुए कार्य की (पीतये) तृप्ति के लिये (सुचेतसः) उत्तम विज्ञानवाले (मनसः) विज्ञान से (ध्यया) ध्यान से (अविह्वरन्तम्) नहीं टेढ़े चलनेवाले (सुवृतम्) उत्तम प्रकार अङ्ग और उपाङ्गों के सहित (रथम्) विमान आदि वाहन को (परि, चक्रुः) सब ओर से बनाते हैं और जिनको हम लोग (आ, वेदयामसि) जनाते हैं (तान्) उनको (नु) निश्चय करके (उ) ही आप लोग शीघ्र ग्रहण कीजिये ॥२॥

भावार्थ : हे बुद्धिमानो ! जो वाहनो के बनाने और चलाने में चतुर शिल्पीजन होवें, उनका ग्रहण और सत्कार करके शिल्पविद्या की उन्नति करो ॥२॥