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Rigveda / 4 / 36 / 4

एकं॒ वि च॑क्र चम॒सं चतु॑र्वयं॒ निश्चर्म॑णो॒ गाम॑रिणीत धी॒तिभिः॑। अथा॑ दे॒वेष्व॑मृत॒त्वमा॑नश श्रु॒ष्टी वा॑जा ऋभव॒स्तद्व॑ उ॒क्थ्य॑म् ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 36 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : ऋभवः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : एक॑म्। वि। च॒क्र॒। च॒म॒सम्। चतुः॑ऽवयम्। निः। चर्म॑णः। गाम्। अ॒रि॒णी॒त॒। धी॒तिऽभिः॑। अथ॑। दे॒वेषु॑। अ॒मृ॒त॒ऽत्वम्। आ॒न॒श॒। श्रु॒ष्टी। वा॒जाः॒। ऋ॒भ॒वः॒। तत्। वः। उ॒क्थ्य॑म् ॥४॥

पदार्थ : हे (वाजाः) ऐश्वर्य्य से युक्त (ऋभवः) बुद्धिमान् जनो ! (तत्) वह (वः) आप लोगों का (उक्थ्यम्) प्रशंसा करने योग्य कर्म कि जिससे आप लोग (श्रुष्टी) शीघ्र (धीतिभिः) अङ्गुलियों के सदृश विलेखनगतियों से (चर्मणः) त्वचा की (गाम्) भूमि को (अरिणीत) प्राप्त हूजिये (अथ) इसके अनन्तर इससे (देवेषु) विद्वानों में (अमृतत्वम्) मोक्षसुख को (आनश) प्राप्त हूजिये और जैसे (एकम्) सहायरहित अर्थात् अकेले (चमसम्) मेघों के सदृश विभक्त (चतुर्वयम्) चार हम लोग (वि, निः, चक्र) करें, वैसे आप लोग भी करो ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो प्रशंसित कर्मों को करते हैं, वे व्यावहारिक और पारमार्थिक सुख को प्राप्त होकर पण्डितवरों में प्रशंसा को प्राप्त होते हैं ॥४॥