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Rigveda / 4 / 38 / 1

उ॒तो हि वां॑ दा॒त्रा सन्ति॒ पूर्वा॒ या पू॒रुभ्य॑स्त्र॒सद॑स्युर्नितो॒शे। क्षे॒त्रा॒सां द॑दथुरुर्वरा॒सां घ॒नं दस्यु॑भ्यो अ॒भिभू॑तिमु॒ग्रम् ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 38 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : द्यावापृथिव्यौ | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब दश ऋचावाले अड़तीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में कैसा राजा हो, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒तो इति॑। हि। वा॒म्। दा॒त्रा। सन्ति॑। पूर्वा॑। या। पू॒रुऽभ्यः॑। त्र॒सद॑स्युः। नि॒ऽतो॒शे। क्षे॒त्र॒ऽसाम्। द॒द॒थुः॒। उ॒र्व॒रा॒ऽसाम्। घ॒नम्। दस्यु॑ऽभ्यः। अ॒भिऽभू॑तिम्। उ॒ग्रम् ॥१॥

पदार्थ : हे राजन् ! आप और सेनापति (त्रसदस्युः) डरते हैं दस्यु जिससे ऐसे होते हुए जो (हि) जिस कारण (वाम्) आप दोनों के भृत्य (सन्ति) हैं उन (पूरुभ्यः) बहुतों से (या) जो (पूर्वा) प्रथम वर्त्तमान (दात्रा) दाता जन आप दोनों (नितोशे) अत्यन्त वध करने में (क्षेत्रासाम्) क्षेत्रों को विभाग करने और (उर्वरासाम्) बहुत श्रेष्ट पदार्थों से युक्त भूमि सेवनेवाले को (ददथुः) देते हो (उतो) और (दस्युभ्यः) साहस करनेवाले चोरों के लिये (उग्रम्) कठिन (अभिभूतिम्) पराजय को और उसके साथ चोरों के लिये (घनम्) जिससे नाश करता है, उसका प्रहार करके कठिन पराजय को देते हो, इससे सत्कार करने योग्य हो ॥१॥

भावार्थ : हे राजा और सेना के अध्यक्ष ! आप दोनों उत्तम प्रकार शिक्षित भृत्यों को रख दुष्टों को नाश करके और विजय को प्राप्त होकर न्याय से राज्य का पालन करो ॥१॥