Rigveda / 4 / 40 / 2
सत्वा॑ भरि॒षो ग॑वि॒षो दु॑वन्य॒सच्छ्र॑व॒स्यादि॒ष उ॒षस॑स्तुरण्य॒सत्। स॒त्यो द्र॒वो द्र॑व॒रः प॑तङ्ग॒रो द॑धि॒क्रावेष॒मूर्जं॒ स्व॑र्जनत् ॥२॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 40 | Mantra No : 2
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : dadhikraavaa | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : satvaa bhariSho gaviSho duvanyasachChravasyaadiSha uShasasturaNyasat. satyo dravo dravaraH pata~Ngaro dadhikraaveShamuurja.m svarjanat .2.
Component Words : satvaa. bhariShaH. go.aiShaH. duvanya.asat. shravasyaat. iShaH. uShasaH. turaNya.asat. satyaH. dravaH. dravaraH. pata~NgaraH. dadhi.akraavaa. iSham. uurjam. svaH. janat .2.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : दधिक्रावा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : सत्वा॑। भ॒रि॒षः। गो॒ऽइ॒षः। दु॒व॒न्य॒ऽसत्। श्र॒व॒स्यात्। इ॒षः। उ॒षसः॑। तु॒रण्य॒ऽसत्। स॒त्यः। द्र॒वः। द्र॒व॒रः। प॒त॒ङ्ग॒रः। द॒धि॒ऽक्रावा॑। इष॑म्। ऊर्ज॑म्। स्वः॑। ज॒न॒त् ॥२॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (सत्वा) प्राप्त करनेवाला (भरिषः) धारण और पोषण में चतुर (गविषः) गौओं की और (दुवन्यसत्) सेवा की इच्छा करता हुआ तथा (इषः) इच्छाओं और (उषसः) प्रातःकालों को (तुरण्यसत्) अपनी शीघ्रता को चाहता हुआ (श्रवस्यात्) अपने श्रवण की इच्छा करे तथा जो (सत्यः) श्रेष्ठों में श्रेष्ठ (द्रवः) स्नेही (द्रवरः) द्रव में रमने वा द्रव अर्थात् गीले पदार्थों को देने और (पतङ्गरः) अग्नि में रमने वा अग्नि को देनेवाला (दधिक्रावा) धारण करने योग्य वाहन पर जाता (इषम्) अन्न (ऊर्जम्) पराक्रम और (स्वः) सुख को (जनत्) उत्पन्न करे, वही राजा आप लोगों को सत्कार करने योग्य है ॥२॥
भावार्थ : प्रजाजनों के साथ जो राजा सत्यवादी, जितेन्द्रिय, सब के सुख की इच्छा करता हुआ, न्यायकारी पिता के सदृश वर्ताव करे, वही प्रजाओं का पालन कर सकता है ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : दधिक्रावा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : सत्वा॑। भ॒रि॒षः। गो॒ऽइ॒षः। दु॒व॒न्य॒ऽसत्। श्र॒व॒स्यात्। इ॒षः। उ॒षसः॑। तु॒रण्य॒ऽसत्। स॒त्यः। द्र॒वः। द्र॒व॒रः। प॒त॒ङ्ग॒रः। द॒धि॒ऽक्रावा॑। इष॑म्। ऊर्ज॑म्। स्वः॑। ज॒न॒त् ॥२॥
पदार्थ : (सत्वा) प्रापकः (भरिषः) धारणपोषणचतुरः (गविषः) गा इच्छन् (दुवन्यसत्) परिचरणमिच्छन् (श्रवस्यात्) आत्मनः श्रवणमिच्छेत् (इषः) इच्छाः (उषसः) प्रभातान् (तुरण्यसत्) आत्मनस्तुरणं त्वरणमिच्छन् (सत्यः) सत्सु साधुः (द्रवः) स्निग्धः (द्रवरः) यो द्रवे रमते द्रवान् ददाति वा (पतङ्गरः) यः पतङ्गेऽग्नौ रमते पतङ्गं ददाति वा (दधिक्रावा) धर्त्तव्ययानक्रमिता (इषम्) अन्नम् (ऊर्जम्) पराक्रमम् (स्वः) सुखम् (जनत्) जनयेत् ॥२॥
अन्वय : हे मनुष्या ! यः सत्वा भरिषो गविषो दुवन्यसदिष उषसस्तुरण्यसच्छ्रवस्याद्यः सत्यो द्रवो द्रवरः पतङ्गरो दधिक्रावेषमूर्जं स्वश्च जनत् स एव राजा युष्माभिः सत्कर्त्तव्योऽस्ति ॥२॥
भावार्थ : प्रजाजनैर्यो राजा सत्यवादी जितेन्द्रियः सर्वेषां सुखमिच्छुर्न्यायकारी पितृवद्वर्त्तेत स एव प्रजाः पालयितुं शक्नोति ॥२॥