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Rigveda / 4 / 40 / 4

उ॒त स्य वा॒जी क्षि॑प॒णिं तु॑रण्यति ग्री॒वायां॑ ब॒द्धो अ॑पिक॒क्ष आ॒सनि॑। क्रतुं॑ दधि॒क्रा अनु॑ सं॒तवी॑त्वत्प॒थामङ्कां॒स्यन्वा॒पनी॑फणत् ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 40 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : दधिक्रावा | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒त। स्यः। वा॒जी। क्षि॒प॒णिम्। तु॒र॒ण्य॒ति॒। ग्री॒वाया॑म्। ब॒द्धः। अ॒पि॒ऽक॒क्षे। आ॒सनि॑। क्रतु॑म्। द॒धि॒ऽक्राः। अनु॑। स॒म्ऽतवी॑त्वत्। प॒थाम्। अङ्कां॑सि। अनु॑। आ॒ऽपनी॑फणत् ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (वाजी) वेगयुक्त (ग्रीवायाम्) कण्ठ में (अपिकक्षे) काँख में (आसनि) मुख में (बद्धः) बँधा और (दधिक्राः) धारण करने योग्यों का धारण करनेवाला हुआ (क्षिपणिम्) शीघ्र करनेवाले को (अनु, तुरण्यति) शीघ्र चलाता है (उत) और (सन्तवीत्वत्) बहुत बलवान् होता हुआ (पथाम्) मार्गों के (अङ्कांसि) चिह्नों को (क्रतुम्) बुद्धि वा कर्म के (अनु) पीछे (आपनीफणत्) अत्यन्त प्राप्त होता है (स्यः) वह आप लोगों से कार्य्यों में नियुक्त करने योग्य है ॥४॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे सब प्रकार शोभित बन्धन से सन्नद्ध किया घोड़ा शीघ्र चलता है, वैसे ही अग्नि आदि से चलाये गये वाहन से शीघ्र जाओ ॥४॥