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Rigveda / 4 / 41 / 7

यु॒वामिद्ध्यव॑से पू॒र्व्याय॒ परि॒ प्रभू॑ती ग॒विषः॑ स्वापी। वृ॒णी॒महे॑ स॒ख्याय॑ प्रि॒याय॒ शूरा॒ मंहि॑ष्ठा पि॒तरे॑व शं॒भू ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 41 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्रावरुणौ | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब प्रजा विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यु॒वाम्। इत्। हि। अव॑से। पू॒र्व्याय॑। परि॑। प्रभू॑ती॒ इति॒ प्रऽभू॑ती। गो॒ऽइषः॑। स्वा॒पी॒ इति॑ सुऽआपी। वृ॒णी॒महे॑। स॒ख्याय॑। प्रि॒याय॑। शूरा॑। मंहि॑ष्ठा। पि॒तरा॑ऽइव। श॒म्भू इति॑ श॒म्ऽभू ॥७॥

पदार्थ : हे राजा और मन्त्रीजनो ! (युवाम्) तुम दोनों (हि) ही को (पूर्व्याय) पूर्व राजाओं ने किये (अवसे) रक्षण आदि के लिये (इत्) ही (प्रभूती) समर्थ (स्वापी) शयन करते हुए (शूरा) भयरहित और शत्रुओं के नाश करनेवाले (मंहिष्ठा) अत्यन्त सत्कार करने योग्य (पितरेव) जैसे पिता और माता, वैसे (शम्भू) सुख को हुवानेवाले [=करनेवाले] (प्रियाय) सुन्दर (सख्याय) मित्रपन के लिये (गविषः) गौओं की इच्छा करनेवाले का हम लोग (परि, वृणीमहे) स्वीकार करते हैं, इससे आप दोनों हम लोगों के पालन करनेवाले निरन्तर होवें ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे प्रजाजनो ! आप लोग उन्हीं राजा आदिकों को स्वीकार करो कि जो पिता के सदृश सब लोगों के पालन करने को समर्थ होवें ॥७॥