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Rigveda / 4 / 42 / 4

अ॒हम॒पो अ॑पिन्वमु॒क्षमा॑णा धा॒रयं॒ दिवं॒ सद॑न ऋ॒तस्य॑। ऋ॒तेन॑ पु॒त्रो अदि॑तेर्ऋ॒तावो॒त त्रि॒धातु॑ प्रथय॒द्वि भूम॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 42 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : त्रसदस्युः पौरुकुत्स्यः | देवता : आत्मा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒हम्। अ॒पः। अ॒पि॒न्व॒म्। उ॒क्षमा॑णाः। धा॒रय॑म्। दिव॑म्। सद॑ने। ऋ॒तस्य॑। ऋ॒तेन॑। पु॒त्रः। अदि॑तेः। ऋ॒तऽवा॑। उ॒त। त्रि॒ऽधातु॑। प्र॒थ॒य॒त्। वि। भूम॑ ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (अहम्) मैं परमात्मा ही (ऋतस्य) सत्य प्रकृति नामक के (सदने) सदन में अर्थात् सब के ठहरने के लिये जो संसार उसमें (दिवम्) बिजुली की (उक्षमाणाः) सेवा करते हुए (अपः) जलों वा अन्तरिक्ष की (अपिन्वम्) सेवा करता हूँ और (ऋतेन) सत्य कारण से (अदितेः) खण्डरहित अन्तरिक्ष का (ऋतावा) सत्य से युक्त (पुत्रः) पुत्र के सदृश वर्त्तमान (उत) निश्चय से (भूम) अनेक प्रकार के (त्रिधातु) तीन अर्थात् सत्त्वगुण रजोगुण और तमोगुण धारण करनेवाले जिसमें उस सम्पूर्ण जगत् को (वि, प्रथयत्) विविध प्रकट करे, उसको मैं (धारयम्) धारण करूँ ॥४॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! मेरे विना इस संसार का धारण करनेवाला अन्य कोई भी नहीं है और जैसा तीन अर्थात् सत्त्वादिगुणमय कारण है, वैसे ही इस कार्य्य को देखो ॥४॥