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Rigveda / 4 / 43 / 4

का वां॑ भू॒दुप॑मातिः॒ कया॑ न॒ आश्वि॑ना गमथो हू॒यमा॑ना। को वां॑ म॒हश्चि॒त्त्यज॑सो अ॒भीक॑ उरु॒ष्यतं॑ माध्वी दस्रा न ऊ॒ती ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 43 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : पुरुमीळहाजमीळहौ सौहोत्रौ | देवता : अश्विनौ | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : का। वा॒म्। भू॒त्। उप॑ऽमातिः। कया॑। नः॒। आ। अ॒श्वि॒ना॒। ग॒म॒थः॒। हू॒यमा॑ना। कः। वा॒म्। म॒हः। चि॒त्। त्यज॑सः। अ॒भीके॑। उ॒रु॒ष्यत॑म्। मा॒ध्वी॒ इति॑। द॒स्रा॒। नः॒। ऊ॒ती ॥४॥

पदार्थ : हे (हूयमाना) आह्वान के किये अर्थात् बुलावा दिये हुए प्रशंसा को प्राप्त (माध्वी) मधुरता आदि गुणों से युक्त (दस्रा) दुःख के नाश करनेवाले (अश्विना) विद्या व्याप्त अध्यापक और उपदेशकजनो ! (वाम्) आप दोनों का (का) कौन (उपमातिः) उपमान (भूत्) होता है। और आप दोनों (कया) किस रीति से (नः) हम लोगों को (आ, गमथः) प्राप्त होते हो और (कः) कौन (वाम्) आप दोनों के (अभीके) समीप में (महः) बड़ा (चित्) भी (त्यजसः) त्याग करने योग्य व्यवहार है और समीप में किस (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से (नः) हम लोगों की (उरुष्यतम्) सेवा करो ॥४॥

भावार्थ : हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! तभी आप दोनों की श्रेष्ठ उपमा होती है कि जब हम लोगों को विद्यावान् करो और दुष्ट दोषों को दूर पहुँचाओ ॥४॥