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Rigveda / 1 / 31 / 3

त्वम॑ग्ने प्रथ॒मो मा॑त॒रिश्व॑न आ॒विर्भ॑व सुक्रतू॒या वि॒वस्व॑ते। अरे॑जेतां॒ रोद॑सी होतृ॒वूर्येऽस॑घ्नोर्भा॒रमय॑जो म॒हो व॑सो ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 31 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : निषादः

विषय : फिर वे दोनों कैसे हैं, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : त्वम्। अ॒ग्ने॒। प्र॒थ॒मः। मा॒त॒रिश्व॑ने। आ॒विः। भ॒व॒। सु॒क्र॒तू॒ऽया। वि॒वस्व॑ते। अरे॑जेताम्। रोद॑सी॒ इति॑। हो॒तृ॒ऽवूर्ये॑। अस॑घ्नोः। भा॒रम्। अय॑जः। म॒हः। व॒सो॒ इति॑ ॥

पदार्थ : हे (अग्ने) परमात्मन् वा विद्वन् ! (प्रथमः) अनादिस्वरूप वा समस्त कार्यों में अग्रगन्ता (त्वम्) आप जिस (सुक्रतूया) श्रेष्ठ बुद्धि और कर्मों को सिद्ध करानेवाले पवन से (होतृवूर्ये) होताओं को ग्रहण करने योग्य (रोदसी) विद्युत् और पृथिवी (अरेजेताम्) अपनी कक्षा में घूमा करते हैं, उस (मातरिश्वने) अपनी आकाश रूपी माता में सोनेवाले पवन वा (विवस्वते) सूर्यलोक के लिये उनको (आविः भव) प्रकट कराइये । हे (वसो) सबको निवास करानेहारे ! आप शत्रुओं का (असघ्नोः) विनाश कीजिये, जिनसे (महः) बड़े-बड़े (भारम्) भारयुक्त यान को (अयजः) देश-देशान्तर में पहुँचाते हो, उनका बोध हमको कराइये ॥ ३ ॥

भावार्थ : कारणरूप अग्नि अपने कारण और वायु के निमित्त से सूर्य रूप से प्रसिद्ध तथा अन्धकार विनाश करके पृथिवी वा प्रकाश का धारण करता है, वह यज्ञ वा शिल्पविद्या के निमित्त से कलायन्त्रों में संयुक्त किया हुआ बड़े-बड़े भारयुक्त विमान आदि यानों को शीघ्र ही देश-देशान्तर में पहुँचाता है ॥ ३ ॥